विष्णु जी का मत्स्य अवतार और हयग्रीव वध
सनातन धर्म में हम सभी के आराध्य प्रभु श्रीहरि विष्णु जी को हम सभी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में जानते हैं I
विष्णु जी का मत्स्य अवतार और हयग्रीव वध

सनातन धर्म में हम सभी के आराध्य प्रभु श्रीहरि विष्णु जी को हम सभी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में जानते हैं I
पृथ्वी पर जब कभी पाप,अधर्म,और बुराई अपने चरम पर होकर मानवता को कष्ट पहुंचने लगती है ,
तब-तब प्रभु श्रीहरि विष्णु अपने भक्तों की रक्षा और धर्म की पुनः स्थापना के लिए धरा पर अवतार लेते है,
जिनकी कथाएँ मत्स्य पुराण ,भगवत पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित हैं I
वैसे तो प्रभु के अनेकों अवतार हुए हैं परन्तु श्रीमद भगवत पुराण के अनुसार के 24 मुख्या अवतार बताये गए हैं ,
जिसमे यहाँ वर्णित 10 अवतार भी सम्मलित है Iआज हम इस वीडियो के माध्यम से प्रभु के मत्स्य अवतार की जानकारी और उनके उद्देश्य साझा करेंगे I
मत्स्य अवतार
मत्स्य अवतार को भगवन विष्णु का प्रथम अवतार माना जाता है जो उन्होंने सतयुग में लिया था
मत्स्य का अर्थ मछली होता है प्रभु ने मछली के रूप में अपना प्रथम अवतार लिया और महाप्रलय से संसार के जीवों ,वनस्पतियों,और मानवता को समाप्त होने से बचाया ,और हयग्रीव नामक राक्षस का वध करके वेदों की रक्षा की जिसकी कथा इस प्रकार है की
सतयुग में राजा सत्यव्रत जिन्हें हम मनु के नाम से भी जानते है वे बहुत ही परोपकारी और तपस्वी राजा थे
एक दिन जब वे प्रातः कृतमाला नदी में तरपान कर रहे थे तभी उनकी अंजुली में एक सुनहरी मछली आ गई
जिसे राजा ने पुनः नदी में डालना चाहा परन्तु मछली ने कहा हे राजन मुझे नदी में वापस न डालें मुझे नदी के बड़े जीव
खा जायेंगे इस बात को सुनकर राजा ने मछली को दयावश अपने कमंडल में रख लिया और वापस महल को लौट आये
मत्स्यावतार की पूर्ण कहानी आप ऑडिओ और वीडियो के सुन्दर माध्यम से भी जान सकते है . वीडियो देखने के लिए कृपया इस वीडियो को क्लिक करें I
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अगले दिन जब राजा ने कमंडल में देखा तो मछली का अकार बहुत बढ़ गया था और वो कमंडल में नहीं समां पा रही थी
ये देखते हुए राजा ने उसे मटके में डाला वहां भी उसका अकार बढ़ता रहा उसके बाद तालाब में और अंततः समुद्र में डाला
परन्तु उसका अकार बढ़ता ही रहा
जब मछली का अकार बढ़ना न रुका तब राजा मनु को समझ आ गया की ये कोई साधारण मछली नहीं है
अतः उन्होंने मछली के सामने हाँथ जोड़कर स्तुति की ,राजा की स्तुति के बाद भगवन विष्णु ने अपने दिव्या रूप के दर्शन दिए
उसके बाद भगवान् विष्णु ने राजा को महाप्रलय की चेतावनी देते हुए बताया की सात दिन बाद महाप्रलय होगा
और आदेश दिया की राजा मनु एक बड़ी नाव का निर्माण करें और उसमे सभी प्रकार के
बीज ,पेड़ पौधे ,वनस्पति,तथा जीव जंतुओं की जोड़ियों के साथ सप्तऋषियों को लेकर बैठ जाएँ
प्रभु के आदेशानुसार राजा मनु ने एक विशाल नौका का निर्माण किया और प्रभु के कहे अनुसार सभी कार्य पूर्ण कर लिए
सातवें दिन महाप्रलय की शुरुवात हुई ,भयंकर आंधी,तूफ़ान ,और वर्षा होने लगी समुद्र में लहरों ने विकराल रूप धारण कर लिया
ऐसा लगने लगा की सृष्टि का अंत आ गया हो ,उसी समय प्रभु विशाल मछली का रूप धारण कर समुद्र में प्रकट हुए
मछली के सिर पर एक सींघ था ,नाव में बैठे सप्तऋषियों के निर्देश पर राजा मनु ने वासुकि नाग को रस्सी बनाकर
मछली के सींघ से बांध दिया
प्रलय के दौरान ही मत्स्यावतार प्रभु ने नाव को खींचते हुए सप्तऋषियों तथा राजा मनु को सत्य ,आत्मज्ञान,और ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया
जिसे आज हम सभी मत्स्यपुराण के नाम से जानते हैं
प्रलय की शुरुवात के दौरान निद्रा के कारन ब्रम्हा जी के मुख से वेद बहार निकल गए जिसे हयग्रीव नामक एक दैत्य ने चुरा लिया
दरअसल ऋषि कश्यप की 13 पत्नियां थी,
ऋषि कश्यप की पत्नियां पहली अदिति जिनसे देवताओं का जन्म हुआ दूसरी दिति जिनसे राक्षसों का जन्म हुआ और तीसरी दनु जिनसे दानवों का जन्म हुआ था ,,,इनमे से हयग्रीव का जन्म ऋषि कश्यप और उनकी पत्नी दनु से हुआ था
दानवों की सहज प्रवित्ति के अनुसार हयग्रीव भी सर्वशक्तिमान बनना चाहता था जिसके लिए
उसने आदिशक्ति की कठिन तपस्या की ,,उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उसे वरदान मांगने को कहा
हयग्रीव ने अमरता का वरदान माँगा परन्तु देवी ने इसे सृष्टि विरूद्ध कहकर मन कर दिया
फिर उसने वरदान माँगा की “मेरी मृत्यु केवल उसी के हाथों हो जिसका नाम और स्वरूप बिल्कुल मेरे जैसा हो
यानि सर घोड़े का और शरीर मनुष्य का हो।।देवी ने उसे यह वरदान दे दिया
सतयुग में महाप्रलय के समय हयग्रीव ने ब्रम्हा जी की निद्रा का लाभ उठाते हुए
वेदों को चुरा लिया और उन्हें समुद्र की गहराई में कहीं छुपा दिया।।।।
जब श्री हरी विष्णु जी महाप्रलय के समय जीवों की रक्षा के लिए मत्स्यावतार लेकर प्रकट हुए
उसी समय उन्होंने समुद्र के बीच मत्स्य रूप से ही एक और अवतार धारण किया जिसे हम विष्णु जी के हयग्रीव अवतार के
रूप में जानते हैं
प्रभु ने हयग्रीव अवतार लेकर समुद्र की गहराई में जाकर वेदों को ढूंढा और हयग्रीव दानव का वध किया
और सभी वेदों को अपने पास सुरक्षित रख लिया
प्रलय समाप्त होने के बाद जब पानी का स्टार गिरने लगा तब ब्रह्मा जी अपनी निद्रा से जागे और भगवान् में वेदों को उन्हें
वापस सौंप दिया ताकि नयी सृष्टि का आरम्भ हो सके।।।
हिन्दू पंचांग के आधार पर मत्स्य जयंती चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है
प्रभु के मत्स्यावतार का बीज मंत्र ॐ नमो भगवते मत्स्यावताराय नमः है जिसके जाप से भय ,शोक का नाश होता है
समाप्त-ॐ नमो भगवते मत्स्यावताराय नमः
메타데이터
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