माँ-बाप के घर लौटने का डर
मैं डरती हूँ,
माँ-बाप के घर लौटने का डर
मैं डरती हूँ,
लौटने से नहीं,
उस नज़र से
जो दरवाज़ा खुलते ही
मेरे माथे पर लिख देगी,
हार।
माँ का आँचल
आज भी वही है,
पर उसमें सिर रखने से पहले
हज़ार प्रश्न खड़े हो जाते हैं।
क्या मैं थककर आई हूँ
या टूटकर?
पिता की चुप्पी
आज भी वैसी ही है,
बस उसमें
मेरे भविष्य की चिंता
और गहरी हो गई है।
मैं जानती हूँ,
यह घर मेरा है,
फिर भी
यहाँ लौटना
अपने आप को
सफाई में बदल देना है।
लोग पूछेंगे,
“क्या हुआ?”
और मैं कहूँगी,
“कुछ नहीं।”
क्योंकि
सब कुछ कह देने का साहस
हर बेटी के हिस्से में नहीं होता।
मैं डरती हूँ
कि मेरे लौटने से
उनकी नींद और हल्की हो जाएगी,
उनकी प्रार्थनाएँ
और लंबी।
पर यह भी सच है,
अगर बहुत देर तक
किसी दीवार से सिर टकराया जाए,
तो लौट आना
कायरता नहीं होता।
मैं अभी खड़ी हूँ,
दो चौखटों के बीच,
जहाँ एक ओर
अपमान की आदत है,
और दूसरी ओर
निस्वार्थ प्रेम का भार।
मैं लौटूँ या न लौटूँ,
यह निर्णय नहीं,
एक पीड़ा है।
और पीड़ा भी वही
जो शब्दों में नहीं,
सिर्फ साँसों में
जी जाती है।

메타데이터
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