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गांव से राष्ट्रपति भवन तक: डॉ. जानुम सिंह सोय का प्रेरणादायक सफर

जब भी झारखंड, आदिवासी समाज और हमारी मातृभाषाओं की बात होती है, तब कुछ ऐसे लोग याद आते हैं जिन्होंने बिना किसी बड़े मंच या चमक-दमक के अपनी…

Joharxp · 2026-05-07 11:48 · 0 claps · 7.1 min read
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गांव से राष्ट्रपति भवन तक: डॉ. जानुम सिंह सोय का प्रेरणादायक सफर

जब भी झारखंड, आदिवासी समाज और हमारी मातृभाषाओं की बात होती है, तब कुछ ऐसे लोग याद आते हैं जिन्होंने बिना किसी बड़े मंच या चमक-दमक के अपनी पूरी जिंदगी समाज और भाषा के लिए लगा दी। ऐसे ही लोगों में एक बहुत बड़ा नाम है — डॉ. जानुम सिंह सोय।

आज के समय में जब कई आदिवासी भाषाएं धीरे-धीरे खत्म होने के खतरे में हैं, तब डॉ. जानुम सिंह सोय जैसे लोग उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आते हैं। उन्होंने सिर्फ ‘हो’ भाषा पर काम नहीं किया, बल्कि उसे पढ़ाई, साहित्य और समाज के बीच एक मजबूत पहचान दिलाने का काम किया।

बहुत लोग अपनी भाषा से प्यार तो करते हैं, लेकिन उसके लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर देना आसान बात नहीं है। डॉ. जानुम सिंह सोय ने यही किया। उन्होंने दिखाया कि अगर कोई इंसान अपने समाज, संस्कृति और भाषा के लिए ईमानदारी से काम करे, तो उसका असर आने वाली कई पीढ़ियों तक जाता है।

शुरुआत एक छोटे गांव से

डॉ. जानुम सिंह सोय का जन्म 8 अगस्त 1950 को झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के एक गांव में हुआ। उनका बचपन बिल्कुल साधारण माहौल में बीता। गांव का जीवन, आदिवासी संस्कृति, लोकगीत, त्योहार और लोगों की बोली — यही सब उनके शुरुआती जीवन का हिस्सा था।

उस समय गांवों में शिक्षा की सुविधा आज जैसी नहीं थी। आदिवासी समाज के बहुत कम लोग उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते थे। लेकिन जानुम सिंह सोय ने पढ़ाई को अपना रास्ता बनाया। उन्होंने हिंदी साहित्य में पढ़ाई की और आगे चलकर उच्च शिक्षा हासिल की।

लेकिन खास बात ये थी कि उन्होंने अपनी मातृभाषा ‘हो’ को कभी पीछे नहीं छोड़ा। अक्सर ऐसा होता है कि लोग पढ़-लिखकर अपनी भाषा और जड़ों से दूर हो जाते हैं। मगर उन्होंने उल्टा रास्ता चुना। जितना ज्यादा उन्होंने पढ़ाई की, उतना ही ज्यादा उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति की अहमियत समझ आई।

‘हो’ भाषा से उनका जुड़ाव

‘हो’ भाषा सिर्फ एक बोली नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान है। इसमें लोककथाएं हैं, गीत हैं, परंपराएं हैं, इतिहास है और लोगों की पूरी जीवनशैली छिपी हुई है।

लेकिन लंबे समय तक इस भाषा को वो सम्मान नहीं मिला जिसकी वो हकदार थी। स्कूलों और कॉलेजों में इसका उपयोग बहुत कम था। किताबें भी बहुत कम उपलब्ध थीं। ऐसे में नई पीढ़ी धीरे-धीरे अपनी भाषा से दूर होती जा रही थी।

डॉ. जानुम सिंह सोय ने इसी समस्या को समझा। उन्होंने महसूस किया कि अगर भाषा को बचाना है, तो उसे सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रखना होगा। उसे किताबों में लाना होगा, शिक्षा से जोड़ना होगा और लोगों के बीच गर्व की भावना पैदा करनी होगी।

यहीं से शुरू हुआ उनका असली संघर्ष।

शिक्षक से भाषा योद्धा तक का सफर

डॉ. जानुम सिंह सोय ने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की। उन्होंने घाटशिला कॉलेज में हिंदी विभाग में पढ़ाना शुरू किया। बाद में वे कोल्हान विश्वविद्यालय से जुड़े और हिंदी विभाग के प्रमुख भी बने।

लेकिन वे सिर्फ एक प्रोफेसर बनकर नहीं रहे। उन्होंने शिक्षा को समाज बदलने का माध्यम बनाया।

उनका मानना था कि आदिवासी छात्रों को अपनी मातृभाषा में भी पढ़ने और लिखने का मौका मिलना चाहिए। क्योंकि जब कोई बच्चा अपनी भाषा में सीखता है, तो वह अपनी संस्कृति से भी जुड़ा रहता है।

उन्होंने ‘हो’ भाषा को विश्वविद्यालय स्तर तक पहुंचाने में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने इस भाषा पर रिसर्च किया, किताबें लिखीं और अकादमिक स्तर पर इसे पहचान दिलाने की कोशिश की।

आज जो लोग ‘हो’ भाषा को पढ़ और लिख पा रहे हैं, उसके पीछे डॉ. जानुम सिंह सोय जैसे लोगों की मेहनत छिपी हुई है।

गांव-गांव जाकर इकट्ठा किए लोकगीत

डॉ. जानुम सिंह सोय का काम सिर्फ किताब लिखने तक सीमित नहीं था। उन्होंने जमीन से जुड़कर काम किया।

जब वे ‘हो’ लोकगीतों और संस्कृति पर रिसर्च कर रहे थे, तब उन्हें एहसास हुआ कि इस विषय पर बहुत कम सामग्री उपलब्ध है। तब उन्होंने गांव-गांव जाकर लोकगीत, कहानियां और परंपराएं इकट्ठा करना शुरू किया।

सोचिए, उस समय ना इंटरनेट था, ना मोबाइल रिकॉर्डिंग जैसी सुविधा। फिर भी उन्होंने लोगों से मिलकर, बुजुर्गों से बातें करके और गांवों में घूम-घूमकर संस्कृति को दस्तावेज़ में बदलने का काम किया।

यही वजह है कि उनका काम सिर्फ साहित्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण का भी बड़ा उदाहरण माना जाता है।

उनकी किताबें क्यों खास हैं?

डॉ. जानुम सिंह सोय ने ‘हो’ भाषा, संस्कृति और समाज पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं। उनकी किताबों में सिर्फ शब्द नहीं हैं, बल्कि पूरा आदिवासी जीवन दिखाई देता है।

उन्होंने आधुनिक कविता, लोकसंस्कृति, सामाजिक परंपराओं और भाषा पर काम किया। उनकी लिखी किताबें आज विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती हैं।

उनकी कुछ चर्चित कृतियों में शामिल हैं:

  • बाहा सागेन
  • हो कुड़ी
  • हो भाषा साहित्य
  • हो दिशुम हो होनको
  • होरो सागेन
  • कुड़ी नाम

इन किताबों की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इनमें आदिवासी समाज को बाहर से नहीं, बल्कि अंदर से समझने की कोशिश की गई है।

आज भी कई लोग आदिवासी समाज को सिर्फ त्योहार, नाच-गाना या पारंपरिक कपड़ों तक सीमित समझते हैं। लेकिन डॉ. जानुम सिंह सोय ने अपने लेखन के जरिए दिखाया कि आदिवासी समाज की अपनी गहरी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत है।

भाषा बचाना सिर्फ शब्द बचाना नहीं होता

बहुत लोग सोचते हैं कि भाषा खत्म होने का मतलब सिर्फ कुछ शब्दों का गायब हो जाना है। लेकिन असल में ऐसा नहीं है।

जब कोई भाषा खत्म होती है, तो उसके साथ एक पूरी संस्कृति खत्म हो जाती है। लोककथाएं खत्म हो जाती हैं। पुरानी यादें खत्म हो जाती हैं। समाज की पहचान कमजोर पड़ जाती है।

डॉ. जानुम सिंह सोय इस बात को बहुत अच्छे से समझते थे। इसलिए उन्होंने हमेशा युवाओं को अपनी भाषा में लिखने और बोलने के लिए प्रेरित किया।

वे कहते थे कि हिंदी और अंग्रेजी सीखना जरूरी है, लेकिन अपनी मातृभाषा को छोड़ देना सही नहीं है। अगर नई पीढ़ी अपनी भाषा में लिखना बंद कर देगी, तो आने वाले समय में उस भाषा का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

आज ये बात और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। क्योंकि डिजिटल दुनिया में वही भाषा आगे बढ़ती है, जो इंटरनेट और टेक्नोलॉजी में मौजूद हो।

पद्मश्री सम्मान और समाज का गर्व

साल 2023 में भारत सरकार ने डॉ. जानुम सिंह सोय को पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया। ये सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज और ‘हो’ भाषा के लिए गर्व का पल था।

जब राष्ट्रपति भवन में उन्हें यह सम्मान मिला, तब बहुत लोगों को लगा कि आखिरकार आदिवासी भाषाओं और उन पर काम करने वाले लोगों को भी देश पहचान देने लगा है।

लेकिन खास बात ये थी कि सम्मान मिलने के बाद भी वे बिल्कुल साधारण और जमीन से जुड़े इंसान बने रहे। उन्होंने कहा कि ये पुरस्कार उन्हें और ज्यादा मेहनत करने की प्रेरणा देगा।

ऐसे लोग ही असली प्रेरणा होते हैं।

आदिवासी भाषाओं की वर्तमान स्थिति

आज भी भारत में कई आदिवासी भाषाएं संघर्ष कर रही हैं। स्कूलों में मातृभाषा की पढ़ाई सीमित है। डिजिटल कंटेंट बहुत कम है। नई पीढ़ी नौकरी और शहरों की वजह से दूसरी भाषाओं की तरफ ज्यादा जा रही है।

ऐसे समय में डॉ. जानुम सिंह सोय का काम और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने बहुत पहले समझ लिया था कि अगर अभी काम नहीं किया गया, तो आने वाले समय में कई भाषाएं सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएंगी।

इसलिए उन्होंने साहित्य, शिक्षा और समाज — तीनों स्तर पर काम किया।

आज जरूरत है कि नई पीढ़ी उनके काम को आगे बढ़ाए।

युवाओं के लिए सबसे बड़ा संदेश

अगर हम डॉ. जानुम सिंह सोय की जिंदगी से कोई सबसे बड़ी सीख ले सकते हैं, तो वो है — अपनी जड़ों से जुड़े रहना।

आज का युवा सोशल मीडिया, इंटरनेट और ग्लोबल दुनिया से जुड़ा हुआ है। ये अच्छी बात है। लेकिन इसके साथ अपनी भाषा और संस्कृति को भी बचाना जरूरी है।

अगर कोई युवा ‘हो’ भाषा में कविता लिखता है, वीडियो बनाता है, ऐप बनाता है, गाने रिकॉर्ड करता है या डिजिटल कंटेंट तैयार करता है — तो वो भी भाषा संरक्षण का काम कर रहा है।

यही वजह है कि आज JoharXP जैसे प्लेटफॉर्म भी महत्वपूर्ण बन जाते हैं। क्योंकि डिजिटल दुनिया में आदिवासी भाषाओं और संस्कृति को जगह देना बहुत जरूरी है।

डॉ. जानुम सिंह सोय ने जो काम किताबों और शिक्षा के माध्यम से शुरू किया, अब नई पीढ़ी उसे टेक्नोलॉजी और इंटरनेट के जरिए आगे बढ़ा सकती है।

सिर्फ लेखक नहीं, एक आंदोलन थे

डॉ. जानुम सिंह सोय को सिर्फ लेखक या प्रोफेसर कहना शायद उनके काम को छोटा करना होगा। वे एक सांस्कृतिक आंदोलन की तरह थे।

उन्होंने लोगों को अपनी भाषा पर गर्व करना सिखाया। उन्होंने साबित किया कि आदिवासी भाषाएं किसी से कम नहीं हैं। उनमें भी साहित्य है, ज्ञान है और समाज को दिशा देने की ताकत है।

उन्होंने कभी बड़े-बड़े दावे नहीं किए। बस लगातार काम करते रहे। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

आज जब हम आदिवासी पहचान, भाषा संरक्षण और सांस्कृतिक विरासत की बात करते हैं, तब डॉ. जानुम सिंह सोय का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

आने वाले समय की जिम्मेदारी

अब सवाल ये है कि आगे क्या?

क्या सिर्फ एक-दो लोगों के काम करने से भाषाएं बच जाएंगी?

नहीं। इसके लिए पूरे समाज को आगे आना होगा।

  • घरों में मातृभाषा बोलनी होगी
  • बच्चों को अपनी भाषा सिखानी होगी
  • लोकगीत और परंपराएं रिकॉर्ड करनी होंगी
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट बनाना होगा
  • किताबें और रिसर्च को बढ़ावा देना होगा
  • स्कूल और कॉलेजों में स्थानीय भाषाओं को महत्व देना होगा

अगर ऐसा हुआ, तभी डॉ. जानुम सिंह सोय जैसे लोगों का सपना सच होगा।

निष्कर्ष

डॉ. जानुम सिंह सोय की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। ये उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक इंसान अपनी भाषा, संस्कृति और समाज को बचाने के लिए पूरी जिंदगी लगा देता है।

उन्होंने हमें ये सिखाया कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि हमारी पहचान होती है।

आज जब पूरी दुनिया तेजी से बदल रही है, तब अपनी जड़ों को संभालकर रखना और भी जरूरी हो गया है। डॉ. जानुम सिंह सोय ने यही काम किया।

उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। खासकर उन युवाओं के लिए, जो अपनी भाषा और संस्कृति के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन शुरुआत कैसे करें, ये नहीं जानते।

शुरुआत छोटी हो सकती है — अपनी भाषा में एक पोस्ट लिखने से, एक गीत रिकॉर्ड करने से, एक कहानी सुनाने से या अपने बुजुर्गों की बातें सुनने से।

क्योंकि भाषा तभी जिंदा रहती है, जब लोग उसे प्यार से बोलते हैं, लिखते हैं और अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।

और यही काम डॉ. जानुम सिंह सोय ने अपनी पूरी जिंदगी किया।

उनके जैसे लोग सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि आने वाले समय का रास्ता भी तैयार करते हैं।

स्रोत और संदर्भ:

  • पद्मश्री सम्मान 2023 से संबंधित सार्वजनिक जानकारी
  • हो भाषा और साहित्य पर उपलब्ध विभिन्न लेख व संदर्भ सामग्री
  • डॉ. जानुम सिंह सोय के साहित्यिक और शैक्षणिक योगदान से जुड़ी सार्वजनिक जानकारी (en.wikipedia.org)

메타데이터
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