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लेह की उस जादुई ज़मीन ने मुझे सिर्फ़ पहाड़ नहीं दिखाए, उसने मुझे ठहरकर जीना सिखाया। ​यह सफ़र…

लेह लद्दाख की एक यात्रा ।

Anupama arya · 2026-07-28 08:42 · 0 claps · 7.4 min read
#leh #laddakh #short-story #roadtrip #inspirational-hindi-story
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Wiki topics: LIT · Literature & Writing ✨ · Lifestyle · General

लेह की उस जादुई ज़मीन ने मुझे सिर्फ़ पहाड़ नहीं दिखाए, उसने मुझे ठहरकर जीना सिखाया। ​यह सफ़र बिल्कुल अचानक शुरू हुआ था। कोई योजना नहीं थी, कोई तैयारी नहीं थी। घर में सब लोग आगरा आने वाले रिश्तेदारों की तैयारियों में लगे हुए थे। तभी लेह से आगे रहने वाली मेरी बड़ी बहन का फ़ोन आया। ​उन्होंने सहज-सी आवाज़ में कहा, "तुम लोग आगरा छोड़कर हमारे पास क्यों नहीं आ जाते?" ​बस... उसी एक वाक्य ने पूरी यात्रा की दिशा बदल दी। ​एक ही दिन में हवाई टिकटें बुक हो गईं और हमारा सफ़र तय हो गया। ​घर में सब बहुत उत्साहित थे, लेकिन मेरे भीतर एक अलग ही हलचल चल रही थी। लंबे सफ़र का नाम सुनते ही सबसे पहले मुझे अपने पेट की चिंता होने लगती है। अक्सर तबीयत ख़राब रहने की वजह से मैं ऐसी यात्राओं से बचती रही हूँ। मन बार-बार यही सोच रहा था—इतनी दूर का सफ़र कैसे कटेगा? ​हम आगरा जैसे शोर से भरे शहर में रहते हैं, जहाँ गाड़ियों की आवाज़ें कभी पूरी तरह ख़ामोश नहीं होतीं। उसी शोर को पीछे छोड़ते हुए हम छह तारीख़ को दिल्ली पहुंचे, क्योंकि अगली सुबह हमारी उड़ान थी। ​एक और उलझन थी—मौसम कैसा होगा? ​सर्दियों के कपड़े रखें या गर्मियों के? ​कोई निश्चित जवाब नहीं था, इसलिए एहतियात में मैंने दोनों तरह के कपड़े बैग में रख लिए। ​अगली सुबह दिल्ली से उड़ान भरी और लगभग एक घंटे बाद हम लेह पहुँच चुके थे। ​हवाई जहाज़ की खिड़की से नीचे झाँका तो मेरी नज़रें वहीं ठहर गईं। ​ज़िंदगी में पहली बार मैं इतने विशाल पहाड़ और उन पर जमी बर्फ़ देख रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सफ़ेद मख़मल की चादर पूरे पर्वतों पर बिछा दी हो। दूर-दूर तक फैली सफेदी, नीला आसमान और बिल्कुल साफ़ हवा... ​कई सालों बाद मुझे ऐसा आसमान दिखाई दे रहा था जिसके रंग पर धुएँ की कोई परत नहीं थी। ​लेकिन असली सफ़र अभी शुरू होना बाकी था। ​लेह एयरपोर्ट से हमें लगभग चार घंटे और गाड़ी से आगे जाना था। ​थोड़ी थकान थी। मन में पेट को लेकर वही पुराना डर भी था। लेकिन जैसे-जैसे गाड़ी पहाड़ों के बीच आगे बढ़ने लगी, वैसे-वैसे मेरे भीतर कुछ शांत होने लगा। ​शहर पीछे छूट चुका था। ​गाड़ियों के हॉर्न नहीं थे। ​जल्दी में भागते लोग नहीं थे। ​बस पहाड़ थे... ​हवा थी... ​और एक ऐसा सन्नाटा, जो डराता नहीं था, बल्कि भीतर उतरता चला जाता था। ​ऐसा लग रहा था जैसे समय ने भी अपनी चाल थोड़ी धीमी कर दी हो। ​हमारे ड्राइवर ने सफ़र शुरू होने से पहले ही समझा दिया था— ​"ऊँचाई पर साँस लेने में थोड़ी भी परेशानी हो तो गाड़ी में ऑक्सीजन सिलेंडर रखा है, इस्तेमाल कर लेना।" ​हम दो गाड़ियों में थे। एक गाड़ी में मैं और मम्मी थे, दूसरी में मेरी दोनों बहनें। ​पहाड़ों की घुमावदार सड़कों पर गाड़ी कभी बादलों के बीच से निकलती, कभी गहरी घाटियों के किनारे-किनारे चलती। हम बातें भी कर रहे थे और बीच-बीच में खिड़की से बाहर देखकर चुप भी हो जाते थे। कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जिनके सामने शब्द अपने-आप छोटे पड़ जाते हैं। ​कुछ देर बाद ड्राइवर भैया मुस्कुराते हुए बोले— ​"अगर बर्फ़ को पास से देखना है तो खारदुंग ला पर उतर जाइए। वापस लौटते समय शायद वहाँ बर्फ़ न मिले।" ​हम सबने एक-दूसरे की तरफ़ देखा और गाड़ियाँ रुक गईं। ​मेरी दोनों बहनें सबसे पहले बाहर निकल गईं। ​मैं भी धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरने लगी... ​लेकिन जैसे ही कुछ कदम आगे बढ़ी, साँस अचानक भारी होने लगी। ​ऊँचाई ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था। ​ऐसा लगा जैसे फेफड़े पूरी हवा नहीं भर पा रहे हों। ​मुझे वापस गाड़ी में बैठना पड़ा। ​बाहर मेरी बहनें बर्फ़ में बच्चों की तरह खेल रही थीं। ​मैं शीशे के उस पार बैठी उन्हें देख रही थी। ​उस पल हल्की-सी उदासी हुई कि जिस बर्फ़ को छूने की इतनी इच्छा थी, उसे मैं छू भी नहीं पाई। ​लेकिन अगले ही क्षण उन को देखकर लगा... ​शायद ख़ुशी हमेशा अपने हिस्से से नहीं मिलती। ​कभी-कभी अपने लोगों की मुस्कान देखकर भी मिल जाती है। ​और तब मुझे क्या पता था... ​कि यह तो इस यात्रा की सिर्फ़ शुरुआत थी। ​आगे पहाड़ों ने अभी बहुत कुछ दिखाना बाकी रखा था...

खारदुंग ला से आगे बढ़ते हुए मुझे धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि इस यात्रा का मक़सद सिर्फ़ जगहें देखना नहीं है। पहाड़ जैसे हर मोड़ पर कुछ नया सिखाने की तैयारी में थे। इस सफ़र की एक और ख़ास बात थी। मेरी बड़ी दीदी के पति भारतीय सेना में एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं। उनकी वजह से हमें लद्दाख़ के कुछ ऐसे इलाक़े देखने का अवसर मिला, जहाँ सामान्यतः हर कोई नहीं जा सकता। रास्ते भर जहाँ-जहाँ सेना की चौकियाँ आईं, वहाँ जवानों ने जिस आत्मीयता से हमारा स्वागत किया, वह आज भी याद है। कोई चाय के लिए पूछता, कोई खाने का आग्रह करता, कोई मुस्कुराकर हालचाल जान लेता। उनकी वर्दी में अनुशासन था, लेकिन व्यवहार में अपनापन। पहाड़ों के उस कठिन जीवन के बीच उनका सहज मुस्कुराना मुझे भीतर तक छू गया। उसी क्षण पहली बार महसूस हुआ कि देश की सीमाएँ सिर्फ़ हथियारों से नहीं, बल्कि ऐसे लोगों की संवेदनाओं से भी सुरक्षित रहती हैं। जो यात्रा बिना किसी योजना के शुरू हुई थी, अब वही मुझे बिल्कुल सही लगने लगी थी। कभी-कभी जीवन के सबसे सुंदर निर्णय सोच-समझकर नहीं, सहजत में लिए जाते हैं। लद्दाख़ का मौसम भी अपने आप में एक पहेली है। एक पल धूप चेहरे को गर्माहट देती है और अगले ही पल बर्फ़ीली हवा हाथों को सुन्न कर देती है। कई बार समझ ही नहीं आता था कि जैकेट पहनकर रखें या उतार दें। मैं अब भी अपनी सेहत को लेकर सावधान थी। खाने-पीने का विशेष ध्यान रख रही थी, लेकिन धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि जिस डर को लेकर मैं घर से निकली थी, वह अब पहले जितना भारी नहीं रहा। कुछ देर बाद हम दीदी के घर पहुँचें। मैंने अपने जीवन में पहली बार ऐसा घर देखा था। चारों तरफ़ पहाड़... दूर तक फैली खामोशी... और उसके बीच एक छोटा-सा घर। वहाँ शोर नहीं था। बस कभी-कभी दूर किसी मस्जिद से आती अज़ान की आवाज़ हवा में घुल जाती थी। घर के सामने सफ़ेद बर्फ़ से ढके पहाड़ ऐसे खड़े थे, जैसे वर्षों से वहीं खड़े होकर हर आने-जाने वाले को चुपचाप देखते आ रहे हों। मैं देर तक उन्हें देखती रही। कुछ दृश्य कैमरे में नहीं, सिर्फ़ मन में ही सुरक्षित किए जा सकते हैं। हम तीनों बहनें और मम्मी कई वर्षों बाद इस तरह एक साथ थीं। बातें शुरू हुईं तो समय का पता ही नहीं चला। बचपन की शरारतें... स्कूल की यादें... पुरानी नाराज़गियाँ... सब एक-एक करके लौटने लगा। कभी हम सब साथ हँस पड़ते, कभी किसी पुराने किस्से पर कुछ पल के लिए चुप हो जाते। पहाड़ों की उस ख़ामोशी में हमारी हँसी और भी साफ़ सुनाई देती थी। धीरे-धीरे हमारा एक छोटा-सा नियम बन गया। सुबह ठीक सात बजे हम घूमने निकल जाते। लद्दाख़ का नक्शा देखकर दूरी का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। यहाँ किसी जगह तक पहुँचने में तीन-चार घंटे लग जाना बिल्कुल सामान्य बात है। दिन का बड़ा हिस्सा गाड़ी में बीतता था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि वहाँ सफ़र थकाता नहीं था। हर मोड़ पर बदलते पहाड़, बदलती रोशनी और बदलता आसमान सफ़र को मंज़िल से ज़्यादा सुंदर बना देते थे। यात्रा पर निकलने से पहले कई लोगों ने हमें डराया था। सबसे ज़्यादा चिंता मम्मी को लेकर जताई गई थी। उनकी उम्र सत्तर वर्ष है। उन्हें वर्टिगो की भी समस्या है। लोग कहते थे— "इतनी ऊँचाई... इतनी कम ऑक्सीजन... बहुत मुश्किल होगी।" लेकिन पूरे सफ़र में सबसे ज़्यादा निश्चिंत अगर कोई दिखाई दिया, तो वह मम्मी ही थीं। वे हर सुबह मुस्कुराकर तैयार हो जातीं। घंटों का सफ़र भी बिना किसी शिकायत के पूरा कर लेतीं। उन्हें देखकर कई बार लगता था... शायद पहाड़ उम्र नहीं देखते। वे सिर्फ़ मन देखते हैं। और फिर मेरे साथ भी कुछ ऐसा हुआ जिसकी मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। जिस पेट की चिंता लेकर मैं घर से निकली थी... जिसके कारण मैं कई यात्राओं से बचती रही थी... वही परेशानी पूरे सफ़र में जैसे कहीं पीछे छूट गई। ना कोई तकलीफ़... ना कोई घबराहट... उस समय पहली बार मुझे लगा कि शरीर की कुछ बीमारियाँ शायद मन के बोझ से भी जुड़ी होती हैं। और जब मन खुली हवा में साँस लेने लगे... तो शरीर भी धीरे-धीरे उसका साथ देने लगता है। यहाँ तक आते-आते मुझे लगने लगा था कि लद्दाख़ सिर्फ़ एक जगह नहीं... एक अलग जीवन-पद्धति है। और मुझे अभी उसके सबसे सुंदर अध्याय से मिलना बाकी था...

बस सामने पहाड़ थे, हवा थी और इतना सन्नाटा कि कई बार अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई देने लगती थी। शायद तभी समझ आया... जहाँ नेटवर्क ख़त्म होता है, वहीं ज़िंदगी से असली कनेक्शन शुरू होता है। यात्रा के आख़िरी दिनों में हम लेह शहर भी रुके। मार्केट की छोटी-छोटी गलियों में घूमते हुए एक बात बार-बार महसूस हुई। लगभग हर दुकानदार मुस्कुराकर बात करता। सामान दिखाने की कोई जल्दी नहीं... बेचने की कोई बेचैनी नहीं... और जाते समय लगभग हर कोई यही कहता— "फिर आइएगा।" उन्हें शायद हमारे चेहरे देखकर समझ आ गया था कि हम बाहर से आए हैं। फिर भी उनके व्यवहार में कहीं भी परायापन नहीं था। उस छोटी-सी मुस्कान में जितना अपनापन था, उतना शायद बड़े शहरों की हज़ार औपचारिक बातों में भी नहीं मिलता। हमने गुरुद्वारा पत्थर साहब के दर्शन किए। वहाँ कुछ देर बैठकर ऐसा लगा जैसे समय भी श्रद्धा में शांत होकर बैठ गया हो। फिर अलग-अलग बौद्ध मठ देखे। हर मठ की अपनी एक ख़ामोशी थी। ऐसी ख़ामोशी... जो सुनाई नहीं देती, महसूस होती है। सिंधु और ज़ंस्कार नदियों का संगम भी देखा। दो अलग-अलग रंगों का पानी... एक-दूसरे के साथ बहता हुआ। उन्हें देखकर जाने क्यों लगा कि जीवन भी शायद ऐसा ही है। हम सब अपनी-अपनी दिशाओं से आते हैं... और फिर किसी मोड़ पर कुछ दूर तक साथ बहते हैं। लेह में मुझे एक और चीज़ बार-बार दिखाई दी। यहाँ बड़े-बड़े मॉल नहीं थे। चमकते हुए विज्ञापन नहीं थे। हर कुछ कदम पर ब्रांडेड दुकानें भी नहीं थीं। फिर भी लोगों के चेहरों पर एक अजीब-सी तसल्ली थी। मैं सोचने लगी... हम शहरों में आख़िर किस चीज़ के पीछे इतनी तेज़ भाग रहे हैं? कहाँ पहुँचना है? कौन-सी ट्रेन हर समय छूटी जा रही है? क्या सचमुच हम कहीं पहुँच रहे हैं... या सिर्फ़ भागते जा रहे हैं? इन सवालों का कोई जवाब मुझे वहाँ नहीं मिला। लेकिन लौटते समय मेरे भीतर ये सवाल पहले से कहीं ज़्यादा साफ़ थे। फिर वह दिन भी आ गया जब वापस लौटना था। हवाई जहाज़ ने जैसे ही उड़ान भरी, मैंने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। वही पहाड़... वही सफ़ेद चोटियाँ... धीरे-धीरे बादलों के पीछे छूटती चली गईं। दिल के किसी कोने से एक ही बात बार-बार निकल रही थी — "इतनी जल्दी क्यों लौटना पड़ा?" शायद कुछ जगहें हमसे विदा नहीं लेतीं। वे हमारे भीतर बस जाती हैं। यह सिर्फ़ एक यात्रा नहीं थी। यह अपने जीवन को थोड़ी दूर खड़े होकर देखने का अवसर था। मैं वहाँ पहाड़ देखने गई थी... लेकिन लौटते समय अपने भीतर थोड़ा और ठहराव लेकर वापस आई। आज भी जब शहर का शोर बहुत ज़्यादा होने लगता है... जब हर कोई कहीं पहुँचने की जल्दी में दिखाई देता है... तो मुझे लद्दाख़ याद आ जाता है। वहाँ का नीला आसमान... बफ़्र से ढके पहाड़... लेह मार्केट की मुस्कुराती दुकानें... और बिना नेटवर्क के बिताए हुए वे दिन। लद्दाख़ अब मेरे पीछे नहीं छूटा है। वह अब मेरे भीतर रहता है। और शायद हमेशा रहेगा।


메타데이터
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