शाह आलम सानी (1728–1806)— हिन्दुस्तान के आख़िरी असरदार मुग़ल बादशाह की कहानी
जिस कमरे से कोई नहीं निकलता था
शाह आलम सानी (1728–1806)— हिन्दुस्तान के आख़िरी असरदार मुग़ल बादशाह की कहानी
जिस कमरे से कोई नहीं निकलता था
Salimgarh Fort Aka Salatins Where Mughal Emperor Shah Alam Sani Was Born In 1728
लाल क़िले के भीतर एक हिस्सा था जिसका नाम किसी ने कभी सुंदर नहीं रखा। उसे कहते थे देवढ़ी-ए-सलातीन — बादशाहों के पोतों के कमरे।
यह वह जगह थी जहाँ हारे हुए शहज़ादे रखे जाते थे। जो तख़्त की दौड़ में पिछड़ गए, या जिनके बाप पिछड़ गए। उन्हें मारा नहीं जाता था। बस वहाँ रख दिया जाता था और भुला दिया जाता था। औरंगज़ेब के बाद के दशकों में वह एक भरी-पूरी बस्ती बन चुकी थी — भूले हुए ख़ून की एक कॉलोनी, क़िले के भीतर।
1714 में वहाँ एक पंद्रह बरस का लड़का लाया गया। नाम अज़ीज़-उद-दीन। क़ुसूर सिर्फ़ इतना कि उसका बाप जहाँदार शाह गृहयुद्ध हार गया था।
उसे युद्ध सिखाया नहीं गया, प्रशासन नहीं सिखाया गया, बाहर की दुनिया उसने देखी ही नहीं। जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि उस दिन के बाद उसके दिन ग़रीबी और उपेक्षा में गुज़रे, उन्हीं कमरों में बंद।
तो उसने वही किया जो उस कमरे में मुमकिन था। उसने पढ़ना शुरू कर दिया। इतिहास की किताबें। औरंगज़ेब के प्रशासनिक नियम, जो उसे ज़बानी याद हो गए। पाँचों वक़्त की नमाज़, जुमे की नमाज़ जामा मस्जिद में। नाच-गाने से दूरी। सरकार का जुमला है कि उसने समझदारी से ख़ुद को दुराचार से बचाए रखा, अपना वक़्त अध्ययन और चिंतन में लगाकर।
वह वहाँ चालीस बरस रहा।
और उसकी क़ैद के चौदहवें बरस, 1728 में, उसी कमरे में उसका एक बेटा पैदा हुआ।
नाम रखा गया अली गौहर।
बाहर, उन्हीं बरसों में, हिन्दुस्तान का सबसे बुरा वक़्त गुज़र रहा था। 1739 में नादिर शाह आया और दिल्ली को क़त्लेआम में डुबोकर तख़्त-ए-ताऊस समेत लौट गया। फिर अब्दाली बार-बार आया। 1761 में पानीपत लड़ा गया।
अली गौहर ने इनमें से कुछ नहीं देखा। उसने अपने बाप को किताबें पढ़ते देखा, और वह भी पढ़ने लगा — क्योंकि उस कमरे में और कुछ करने को था ही नहीं।
सरकार 1754 में उस कमरे की आबादी गिनते हैं: पाँच बेटे, एक बेटी, मरहूम भाई के छह बेटे, एक पोता, एक पड़पोता। चौदह शहज़ादे, जो ग़रीबी और एकांत साथ बाँट चुके थे।
चौदह शहज़ादे और चालीस बरस। यह अली गौहर की पूरी दुनिया थी, छब्बीस साल की उम्र तक।
एक रात में क़ैदी से वलीअहद
Upon Deposition Of Mughal Emperor Ahmed Shah Bahadur By Wazir Imad-ul-mulk In 1754 , Mughal Prince Aziz-ud-din was crowned Puppet Emperor Alamgir Sani And His Son Ali Gauhar Crown Prince
जून 1754 में दरवाज़ा खुला — और वजह ख़ूबसूरत नहीं थी।
वज़ीर इमाद-उल-मुल्क ने बादशाह अहमद शाह को अंधा करके तख़्त से उतार दिया, और फिर उन्हीं कोठरियों की तरफ़ देखा। उसे एक ऐसा आदमी चाहिए था जो रास्ते में न आए। नरम, धार्मिक, बूढ़ा, बेदाँत।
उसकी नज़र पचपन बरस के अज़ीज़-उद-दीन पर पड़ी — जो चालीस बरस से इतिहास पढ़ रहा था और शायद इसीलिए किसी के लिए ख़तरा नहीं लगता था।
वह बाहर निकला और आलमगीर सानी बन गया। और छब्बीस बरस का अली गौहर, एक ही रात में, हिन्दुस्तान का वलीअहद।
काग़ज़ पर सब कुछ बदल गया। हर शहज़ादे पर तीस हज़ार घोड़ों का मनसब लिखा गया। सरकार इसके ठीक बाद जोड़ते हैं कि वे काग़ज़ पर लिखे महज़ हुक्म रहे — ज़मीन थी ही नहीं जिससे तनख़्वाह निकलती।
और अब वह दृश्य जो इस पूरी कहानी की कुंजी है।
शाकिर ख़ान नाम का एक आदमी था, शहज़ादा अली गौहर का अपना दीवान। एक दिन वह ग़रीबों के लंगर से शोरबे का एक प्याला उठाकर शहज़ादे के पास ले गया, मुआयने के लिए।
शहज़ादे ने प्याला देखा और कहा कि इसे महल की औरतों को दे दो।
क्योंकि हरम की रसोई में तीन दिन से आग नहीं जली थी।
उसी दौर का एक और दिन: शहज़ादियाँ भूख बर्दाश्त नहीं कर सकीं और पर्दे की परवाह छोड़कर महल से बाहर भाग निकलीं। मगर क़िले के दरवाज़े बंद थे। वे एक दिन और एक रात मर्दाना हिस्से में बैठी रहीं, जब तक उन्हें समझा-बुझाकर वापस नहीं भेज दिया गया।
यह उस दौर का दृश्य है जब अली गौहर का बाप बादशाह बन चुका था। तख़्त मिल गया था। खाना नहीं मिला था।
वलीअहद ने कोशिश की। 1757 और 1758 में उसे रोहतक-मेवात भेजा गया — शाही सत्ता बहाल करने, राजस्व वसूलने। वह नाकाम रहा, और सरकार वजह छिपाते नहीं: इमाद किसी शहज़ादे को यह मौक़ा नहीं देना चाहता था कि वह कोई सूबा वापस लेकर दौलत और फ़ौज हासिल कर ले। इसलिए उसने बादशाह को मजबूर किया कि वह अपने ही बेटों की मुहिमों को भूखा रखे और नाकाम करे। एक मुहिम पर तो वह बीमार बादशाह को घसीटकर ले गया — इसलिए कि उसी के बेटे को खदेड़ा जा सके।
फिर 19 मई 1758।
इमाद ने दिल्ली में अली गौहर की हवेली पर हमला किया। सरकार यहाँ उसे “बादशाह के बेटों में सबसे बड़ा और सबसे क़ाबिल” कहते हैं — और यही उसका ख़तरा था।
वह लड़ता हुआ बाहर निकल गया।
कुछ दिन उसने एक मराठा सेनापति विट्ठल शिवदेव के यहाँ पनाह ली। फिर विट्ठल उसे छोड़कर चला गया, और तीस बरस का शहज़ादा — सरकार के शब्दों में — पूरी बेसहारगी में जंगल की तरफ़ निकल गया।
गंगापार रुहेलों के इलाक़ों से होता हुआ वह 2 जनवरी 1759 को लखनऊ पहुँचा।
नवंबर में इमाद ने उसके बाप को क़त्ल कर दिया
हज़ार मील दूर, अपने सिर पर अपना ताज

Mughal Emperor Shah Alam II was crowned at the British factory in Patna, Bihar on 10 October 1760
अब वह बादशाह था, और उसके पास कुछ नहीं था। तख़्त नहीं, राजधानी नहीं, ख़ज़ाना नहीं, फ़ौज नहीं।
इसलिए 1760 में, बिहार पर हमले के बीच, दिल्ली से हज़ार मील दूर, उसने अपनी ताजपोशी ख़ुद कर ली और अपना नाम रखा — शाह आलम सानी।
फिर बारह बरस वह उस नाम को सच बनाने की कोशिश करता रहा। बिहार पर चार बार हमला किया, चारों बार नाकाम। बंगाल पर छापा नाकाम। शुजा-उद-दौला के साथ बुंदेलखंड गया। नजीब और अफ़ग़ान सरदारों से मिला।
1764 में बक्सर आया।
वह मीर क़ासिम और शुजा के साथ, अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मैदान में था। (उसी मैदान में, उसी तरफ़, एक फ़ारसी नाम का आदमी मुग़ल पैदल फ़ौज की कमान सँभाल रहा था — मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान। आगे वह इस कहानी का सबसे अहम आदमी बनेगा।)
बक्सर हार गया। और हारने के बाद शाह आलम ने वह किया जो उसकी पूरी ज़िंदगी का ढर्रा है — उसने पाला बदल लिया।
1765, इलाहाबाद। लॉर्ड क्लाइव के साथ संधि। शाह आलम बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप देता है। बदले में एक सालाना रक़म, और रहने के लिए इलाहाबाद का क़िला।
यह हिन्दुस्तान की तारीख़ का सबसे नतीजाख़ेज़ काग़ज़ है। कंपनी उस दिन एक व्यापारी कंपनी से एक राजस्व-सत्ता बन जाती है। दस्तख़त करने वाला सैंतीस बरस का है और उसके पास कोई चारा नहीं है।
अगले छह बरस वह उस क़िले में रहता है। सरकार का अनुभाग-शीर्षक इन बरसों के लिए यह है: “इलाहाबाद के क़िले में अंग्रेज़ों द्वारा अपमानित।”
सोलह बरस बाद वे इसी की तरफ़ लौटेंगे और लिखेंगे कि शाह आलम अंग्रेज़ों से मदद माँग ज़रूर लेता था, मगर उसका लगातार का इरादा था कि वह अवध के नवाब की तरह उनके हाथों की कठपुतली कभी नहीं बनेगा, और न रोज़ किसी अंग्रेज़ निगराँ के हाथों वैसी बेइज़्ज़ती चाहता था जैसी इलाहाबाद में झेल चुका था।
यह एक कमज़ोर आदमी है। मगर उसके पास एक लकीर है — और वह लकीर किसी और के क़िले में खिंची।
1771 में वह महादजी सिंधिया से समझौता करता है। मराठे उसे दिल्ली वापस ले जाएँगे। सरकार लिखेंगे कि इसी कूच के बाद से शाह आलम को महादजी पर अटूट भरोसा रहा — मरते दम तक।
घोड़े पर एक चौवालीस बरस का आदमी

In January 1772, Mughal Emperor Shah Alam II finally entered Delhi under the escort and protection of the Maratha leader Mahadaji Shinde, ending his 12-year exile.
6 जनवरी 1772। वह अपने पुरखों की राजधानी में घोड़े पर सवार होकर दाख़िल होता है।
छब्बीस बरस उसने उस क़िले की जेल में काटे थे। अगले अठारह उससे बाहर, भागते हुए। अब वह लौट रहा है, इस बार बादशाह की तरह।
शहर उम्मीद से भरा है। सरकार यह उम्मीद पूरी दर्ज करते हैं: हर तबक़े को लगता है कि हुक्मरान के लौटने से रौनक़ लौटेगी, बारह बरस की वीरानी और ज़िल्लत ख़त्म होगी, दिल्ली फिर सिर उठाएगी।
और फिर अगला पैराग्राफ़ उस उम्मीद को काट देता है।
बादशाह को यह भी नहीं मालूम कि अपना ख़र्च कैसे चलाए। ख़ज़ाना ख़ाली। ख़ालसा ज़मीनें हाथ से निकल चुकीं। महलों से साज़-ओ-सामान उतार लिया गया। शाही भंडार बरसों पहले ख़त्म। इमारतें मरम्मत के बिना। और क़िले की दीवारें तक चटख़ी हुईं। ऊपर से भारी क़र्ज़, फ़ौज की बक़ाया तनख़्वाह, और मराठों की वह सब्सिडी जो अभी अदा नहीं हुई।
लाल क़िला मुग़लिया सत्ता का सबसे बड़ा प्रतीक है। सरकार उसे प्रतीक की तरह नहीं, इमारत की तरह देखते हैं — और उसकी दीवारें चटख़ी हुई हैं।
ग्यारह दिन बाद वह अपनी पहली मुहिम पर निकलता है। निशाना है ज़ाबिता ख़ान। फ़रवरी में चंडीघाट पर फ़ैसला होता है: नजफ़ ख़ान अपने ऊँट-तोपख़ाने गंगा के बीच के एक टापू पर ले जाता है और इतने नज़दीक से गोले बरसाता है कि लड़ाई पलट जाती है। ज़ाबिता भागकर पथरगढ़ में छुपता है; उसका दूसरा गढ़ घौसगढ़ लूट लिया जाता है; और पथरगढ़ का घेरा नजफ़ ख़ान उसका पानी काटकर तोड़ता है।
यह शाह आलम के दौर की पहली फ़तह है।
बादशाह उस वक़्त दस मील पीछे अपने ख़ेमे में है। ख़बर उस तक दोपहर को पहुँचती है। और तब वह वह काम करता है जो सरकार दर्ज कर लेते हैं: वह अपनी दाढ़ी दोनों हाथों से पकड़कर नजफ़ ख़ान की तरफ़ बढ़ाता है और कहता है कि तुमने मेरी आबरू बचा ली।
मुग़ल दरबार में दाढ़ी इज़्ज़त की जगह है। उसे दोनों हाथों से किसी की तरफ़ बढ़ा देना ख़ुद को उसके हवाले कर देना है। यह एक बादशाह की मुद्रा है — मगर एक ऐसे बादशाह की जिसकी आबरू कोई और बचाता है, और जो यह जानता है।
उसी बरस के आख़िर में इसका ठीक उलटा दृश्य आता है। मराठे अपनी सब्सिडी माँगने आते हैं, और वही आदमी — जिसके महलों से फ़र्नीचर उतर चुका है — फ़्रांसीसी सिपहसालार रेने मादेक के सामने उनसे कहता है कि वह अपने हक़ जानता है; कि वह सम्राट है; और कि जाट और रुहेले बाग़ी हैं जिन्होंने उसकी अधीनता वाले इलाक़े हड़प रखे हैं।
क़ानूनी तौर पर यह बिल्कुल दुरुस्त है।
साम्राज्य की भाषा बची हुई है। साम्राज्य नहीं।
अगले दस बरस एक ही आदमी के हैं। मिर्ज़ा नजफ़ ख़ान सफ़वी शाही ख़ानदान का था — इसीलिए “मिर्ज़ा”। नादिर शाह ने उस वंश को उखाड़ा तो वह हिन्दुस्तान चला आया। 1772 से वह मीर बख़्शी है, और वह वही करता है जो पचास बरस से किसी ने नहीं किया: उसने मुग़ल फ़ौज दोबारा बनाई — यूरोपीय तर्ज़ पर पैदल फ़ौज, परंपरागत घुड़सवारी के साथ। इतिहासकार एच. जी. कीन का हिसाब है कि 1781 तक, बंगाल की ब्रिटिश फ़ौज को छोड़कर, हिन्दुस्तान की सबसे ताक़तवर फ़ौज उसी की थी।
1775 में जाट बरसाना में हारे और गुड़गाँव, रेवाड़ी, झज्जर, नारनौल, बल्लभगढ़ शाही राज में लौटे। 1776 में डीग गिरा। 1777 में रुहेला बग़ावत कुचली गई। 1779 में उसने ख़ुद मैदान में उतरकर सिखों और ज़ाबिता ख़ान को हराया। उसी ने कोल का नाम बदलकर अलीगढ़ रखा।
सरकार उसे मध्यकालीन भारत को फ़ारस की आख़िरी बड़ी देन कहते हैं।
और उन्हीं दस बरसों में दरबार में उसके ख़िलाफ़ अब्दुल अहद ख़ान बैठा है, जो बादशाह के कान भरता रहता है। सरकार इस दुश्मनी को साम्राज्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहते हैं — और शाह आलम की मनुष्य-पारखी क्षमता पर सबसे कठोर अभियोग। उनका हिसाब यह है कि नजफ़ को अपने ग्यारह में से आठ बरस नाक़ाबिल प्रतिद्वंद्वियों से जूझने में गँवाने पड़े।
यही सरकार का असल इल्ज़ाम है। वे यह नहीं कहते कि शाह आलम ने साम्राज्य खो दिया — वह तो उसे टूटा हुआ ही मिला था। वे यह कहते हैं कि उसके पास एक क़ाबिल आदमी था, और उसने आठ बरस उसे बरबाद किया।
अगस्त 1781 में नजफ़ ख़ान बिस्तर पकड़ लेता है। अप्रैल 1782 में मर जाता है। उसकी बेटी फ़ातिमा उसके लिए मक़बरा बनवाना शुरू करती है — और पैसा ख़त्म हो जाता है। वह मक़बरा आज तक अधूरा है। उसकी मौत के दो बरस के भीतर, जो इलाक़ा उसने जीता था, लगभग पूरा हाथ से निकल गया।
जिस आदमी ने साम्राज्य को उसकी आख़िरी फ़ौज दी, उसकी क़ब्र पूरी करने के लिए उस साम्राज्य के पास पैसे नहीं थे।
(उसी बरस, उसी शहर से, उनसठ बरस का मीर तक़ी मीर अपना सामान बाँधकर लखनऊ चला गया।)
वह दरवाज़ा जो उसने बंद रखा

Shah Alam II and Bidar Bakht were connected during the chaotic events of 1788 when the Rohilla chief Ghulam Qadir deposed and blinded Shah Alam II and temporarily placed Bidar Bakht on the Mughal throne as a puppet ruler under the name Jahan Shah.
अब उस चीज़ पर आना पड़ेगा जिसके बिना यह कहानी झूठी रहेगी।
शाह आलम का बाप उस कमरे में चालीस बरस बंद रहा था। शाह आलम ख़ुद उसमें पैदा हुआ था और छब्बीस बरस उसमें रहा था।
और बादशाह बनने के बाद उसने वह कमरा बंद रखा।
उसके ख़ानदान ने मुहम्मद शाह की शाख़ से तख़्त छीना था — उस शाख़ के आख़िरी वैध बादशाह अहमद शाह को अंधा करके, मारकर। और उस शाख़ के वंशजों को उन्हीं सलातीन कोठरियों में डाल दिया था।
सरकार दर्ज करते हैं: चौंतीस बरस, बिना किसी राहत के।
इस बीच शाह आलम की कंजूसी उम्र के साथ और ख़ज़ाने के बढ़ने के साथ बढ़ती गई। 1765 की संधि के बाद बंगाल के ख़िराज से उसने बड़ा जमाव किया, और पथरगढ़-घौसगढ़ की लूट से भी — यानी उसी फ़तह से जिस पर उसने नजफ़ ख़ान की तरफ़ अपनी दाढ़ी बढ़ाई थी।
और उसने अपने क़ैदी रिश्तेदारों को सबसे मोटी रोज़ाना रोटी से ज़्यादा कुछ देने से इनकार कर दिया। वह रोटी भी हमेशा नहीं पहुँचती थी।
पूर्व बादशाहों के भूखे पोते और भतीजे इतना शोर मचाते थे कि वह जेल की दीवारों के पार, दरबार में आए विदेशी मेहमानों तक जाता था — कोम्त द मोदाव 1775 में, कैप्टन पेस्टर 1804 में। और सरकार उस शोर की उपमा देते हैं: किसी उपेक्षित चिड़ियाघर में भूखे जानवरों की चीख़ों जैसी।
वह चिड़ियाघर उसका अपना बचपन था।
वह भूख ठीक वही भूख थी जिसके लिए उसने कभी ख़ुद ग़रीबों के लंगर का शोरबा भिजवाया था।
चौंतीस बरस तक कोई हिसाब चढ़ता रहे, तो एक दिन वसूल होता है।
क़िले की दीवारों के बाहर अपनी हवेली में एक बूढ़ी औरत रहती थी — मलिका-ए-ज़मानी, मुहम्मद शाह की प्रमुख विधवा। उसने अपने सौतेले बेटे अहमद शाह को पाला था, और वह यह कभी नहीं भूली कि शाह आलम के बाप ने अहमद शाह से उसकी विरासत और उसकी आँखों की रोशनी छीनी थी।
1788 में उसने एक अफ़ग़ान सरदार को बारह लाख रुपये की पेशकश की। क़ीमत यह थी कि शाह आलम की जगह बिदार बख़्त को बिठाया जाए — अहमद शाह का वही बेटा, जो चौंतीस बरस से उन्हीं कोठरियों में भूखा पड़ा था।
उस अफ़ग़ान का नाम ग़ुलाम क़ादिर था। वह ज़ाबिता ख़ान का बेटा और नजीब-उद-दौला का पोता था — उसी ख़ानदान का, जिसे शाह आलम ने 1772 में चंडीघाट पर हराया था।
उसकी उम्र बीस बरस के आसपास थी।
15 जुलाई 1788 को नाज़िर ने उसे और इस्माइल बेग को महल में दाख़िल करा दिया। तीन दिन बाद शहर उनके क़ब्ज़े में था। फिर पैसे का दबाव शुरू हुआ — महाराष्ट्र के काफ़िरों के ख़िलाफ़ एक पवित्र युद्ध के नाम पर। शाह आलम हर माँग के आगे झुका और 24 जुलाई को अपने बेटे सुलेमान शुकोह को बंधक भेज दिया।
30 जुलाई को दोनों ख़ान क़िले में आए और क़ुरआन पर हलफ़ उठाया कि वे शाह आलम के वफ़ादार रहेंगे।
रेड बटालियन के कमांडेंट ने कहा कि वह उन्हें रोक सकता है। वह लड़ने को तैयार था।
बादशाह ने उसे मना कर दिया।
सरकार का अगला वाक्य ठंडा है: दो हज़ार अफ़ग़ानों ने महल पर क़ब्ज़ा कर लिया और बादशाह के अपने पहरेदारों को बाहर खदेड़ दिया — एक भी वार चले बिना।
अगले दिन बिदार बख़्त की ताजपोशी हुई।
अब बादशाह क़ैदी था और उससे उसका ख़ज़ाना माँगा जा रहा था। उसने कहा कि जो भंडारों में मिल चुका है उसके अलावा कुछ नहीं।
ग़ुलाम क़ादिर उसके पास आकर बैठ गया, बेतकल्लुफ़ी से अपना हाथ उसकी गर्दन में डाला, और अपने बादशाह के चेहरे पर तंबाकू का धुआँ उड़ाया।
फिर उसे धूप में बिठा दिया गया, बिना खाने के, बिना पानी के।
बार-बार पूछे जाने पर, आख़िर, उस आदमी ने कड़वाहट में जवाब दिया:
“जो मेरे पास था वह तुम भंडारों में पा चुके हो। क्या मैंने कुछ अपने पेट में छिपा रखा है?”
रुहेले ने कहा:
“शायद तुम्हारा पेट चीरना पड़े।”
10 अगस्त 1788 को ग़ुलाम क़ादिर ने साठ बरस के बादशाह की आँखों में सुइयाँ चुभवा दीं।
और अगले दिन उसने दरबारी चित्रकार को बुलवाया।
उसने हुक्म दिया कि उसकी तस्वीर बनाई जाए — उस लम्हे की, जब वह अपने अधमरे मालिक के सीने पर घुटने टेके हुए था और अपने ख़ंजर से उसकी एक आँख की पुतली निकाल रहा था। दूसरी आँख क़ंधारी ख़ान ने निकाली।
एक आदमी अपने बादशाह को अंधा करता है, और फिर एक कलाकार बुलवाता है ताकि यह दर्ज हो जाए।
कला यहाँ गवाह नहीं है। कला यहाँ जुर्म का हिस्सा है।
घायल बूढ़े को कई दिन पानी की एक बूँद के बिना छोड़ा गया। तीन ख़िदमतगार मार डाले गए और दो सक़्क़े तलवार से ज़ख़्मी किए गए, ताकि बाक़ी लोग मदद करने से डरें।
2 अक्तूबर को महादजी की फ़ौज ने दिल्ली वापस ले ली। ग़ुलाम क़ादिर भागा, अगले बरस पकड़ा गया और मार डाला गया — बीस-बाईस बरस की उम्र में।
16 अक्तूबर 1788 को अंधा शाह आलम दोबारा तख़्त पर बिठाया गया।
वह अठारह बरस और जिएगा।
फटी हुई चाँदनी के नीचे
In 1789, Mahadji Shinde (Scindia) and the blinded Mughal Emperor Shah Alam II were bound by a protector-emperor dynamic, highlighted by the brutal retribution exacted upon the Rohilla rebel Ghulam Qadir. Following the horrific blinding of Shah Alam II in 1788, Mahadji Shinde had captured Delhi and restored the sovereign to his throne.
बहाली के बाद पहला काम अहसान चुकाना था। शाह आलम ने महादजी को वकील-उल-मुतलक़ और अमीर-उल-उमरा के ख़िताब दिए, और आगरा का क़िला, मथुरा और वृंदावन सौंप दिए।
1788 से दिल्ली में एक मराठा छावनी स्थायी रूप से बैठ गई। और उसका पूरा ख़र्च मुग़ल ख़ज़ाने से जाता था।
यानी अंधा बादशाह अब उन लोगों को पाल रहा था जो उसकी हिफ़ाज़त कर रहे थे।
फिर 12 फ़रवरी 1794 को महादजी सिंधिया पूना में मर गया।
यह उस आदमी की मौत थी जिस पर शाह आलम ने 1771 के बाद से अपना पूरा भरोसा बाँध रखा था। उसकी जगह उसका उत्तराधिकारी दौलत राव सिंधिया आया — जो उस वक़्त पंद्रह बरस का था।
बादशाह अब छियासठ बरस का था, अंधा, और उसके पास बचा हुआ इकलौता आदमी भी जा चुका था।
पचहत्तर बरस की उम्र में उसने एक आख़िरी सियासी चाल चली।
1803 में दूसरा आंग्ल-मराठा युद्ध छिड़ चुका था। शाह आलम मराठों से पीछा छुड़ाना चाहता था — तो उसने जनरल लेक के पास एक ख़ुफ़िया संदेश भेजा।
7 सितंबर को लेक अलीगढ़ से निकला। सामने दो और निशाने थे, आगरा और ग्वालियर, मगर दिल्ली पहले चुनी गई — क्योंकि वहाँ से बुलावा आया था।
11 सितंबर 1803, पटपड़गंज। लेक की फ़ौज दौलत राव सिंधिया की फ़ौज से भिड़ी, जिसकी कमान फ़्रांसीसी जनरल लुई बुर्कां के हाथ थी। लगभग तीन हज़ार मराठे मारे गए।
और वे मराठे मैदान में शाह आलम के नाम पर लड़ रहे थे — उसी बादशाह के नाम पर जिसने दूसरी तरफ़ को बुलाया था।
14 सितंबर को अंग्रेज़ फ़ौज दिल्ली में दाख़िल हुई। वे लाल क़िले में उस आदमी को ढूँढ़ते पहुँचे जिसके नाम पर वह पूरा युद्ध लड़ा गया था।
और उन्होंने उसे इस हाल में पाया: एक अंधा बूढ़ा आदमी, एक फटी हुई चाँदनी के नीचे बैठा हुआ।
तैमूर का ख़ानदान। अकबर की गद्दी। एक फटा हुआ शामियाना।
कंपनी ने उसे अपनी हिफ़ाज़त में ले लिया, दिल्ली के आस-पास के छोटे-से इलाक़े पर नाममात्र की संप्रभुता दी, और नब्बे हज़ार रुपये महीना की पेंशन बाँध दी। अड़तीस बरस पहले उसी ने इन्हीं लोगों को बंगाल की दीवानी दी थी।
और फिर भी एक अजीब चीज़ बची रही। हिन्दुस्तान भर के नवाब और सूबेदार अब भी अपनी गद्दी पर बैठते वक़्त उसी की औपचारिक मंज़ूरी माँगते थे। सिक्के उसके नाम के ढलते थे। जुमे का ख़ुतबा उसके नाम से पढ़ा जाता था। अंग्रेज़ों ने उसे “किंग ऑफ़ डेल्ही” कहा, और उसके मरने के बाद तीस बरस तक उसके नाम के सिक्के ढालते रहे।
उसी के ज़माने में दिल्ली की गलियों में यह फ़िक़रा चल पड़ा था:
सल्तनत-ए-शाह आलम, अज़ दिल्ली ता पालम
और आख़िरी बरसों के बारे में एक ब्यौरा दर्ज है जिसे पढ़कर रुकना पड़ता है। उन बरसों में उसकी सत्ता सिर्फ़ अपने महल के भीतर थी। और उन्हीं बरसों में उसने अपने ख़ज़ाने में दस लाख रुपये से ज़्यादा जमा कर लिए।
जो आदमी अपने ही ख़ून के लोगों को मोटी रोटी से ज़्यादा नहीं देता था, वह अंधा, बेबस, अंग्रेज़ों की पेंशन पर, अपने महल के भीतर, आख़िर तक जोड़ता रहा।
वह आदत उसके साथ गई।
19 नवंबर 1806 को वह मरा। अट्ठत्तर बरस का था।
उसे मेहरौली में दफ़्न किया गया, क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी की दरगाह के पास, मोती मस्जिद के बग़ल में एक संगमरमर के घेरे में। तख़्त पर उसका बेटा बैठा, जिसका नाम अकबर सानी रखा गया — और जो पचास बरस बाद उसी घेरे में उसके बग़ल में दफ़्न होगा।
उसका ख़ुदा

Mughal Emperor Shah Alam II held a deep personal devotion to Sufism, reflected in his spiritual leanings toward the Chishti and Qadiri orders, his poetry under the pen name Aftab, and his final resting place next to a historic Sufi shrine in Delhi.
अब उस आदमी के भीतर।
उसका मज़हबी ढाँचा उसे उसी कमरे में मिला। बाप ने औरंगज़ेब को अपना आदर्श चुना था, तख़्त पर बैठते ही उसी का ख़िताब लिया, पाँचों वक़्त की नमाज़ बाहरी मस्जिद में और जुमा जामा मस्जिद में जमात के साथ पढ़ी, और नाच-गाने से दूरी रखी। सरकार लिखते हैं कि उसने ख़ुद को अध्ययन और चिंतन से बचाए रखा।
बेटे ने वह अनुशासन तो लिया, मगर वह सख़्ती नहीं। यह फ़र्क़ बुनियादी है और आगे साफ़ हो जाएगा।
शाह आलम की मज़हबी दुनिया की सबसे साफ़ गवाही एक ख़त है।
अठारहवीं सदी की दिल्ली के सबसे बड़े आलिम शाह वलीउल्लाह देहलवी के पत्रों में एक मकतूब है जिसका शीर्षक ही सब कुछ बता देता है: शाहज़ादा वाला गौहर के नाम — जिन्होंने तरीक़त व इरशाद की इस्तिदआ की थी।
शहज़ादे ने ख़ुद माँगा था।
शाह वलीउल्लाह लिखते हैं कि यह सुनकर उनका दिल बाग़-बाग़ हो गया, क्योंकि बादशाहों की तबीयत की पाकीज़गी दुनिया की भलाई का सबब बनती है। और फिर उन्होंने वह भेजा जो एक सूफ़ी शेख़ अपने तालिब को भेजता है।
एक दस्तार, तबर्रुक के लिए। पूरा क़ादरी सिलसिला — अबू ताहिर मदनी से शुरू होकर, अब्दुल वहाब शारानी, जलालुद्दीन सुयूती और मुहीउद्दीन इब्न अरबी से होते हुए, ग़ौस-उल-आज़म अब्दुल क़ादिर जीलानी तक। और एक पूरा रोज़नामचा: इशराक़ की दो रकअतें जब सूरज नेज़े भर चढ़ जाए, चाश्त की चार, ज़वाल की चार, मग़रिब के बाद छह, तहज्जुद की आठ, वित्र की तीन। हर महीने की तेरह, चौदह, पंद्रह के नफ़ली रोज़े। चार वज़ीफ़े।
और आख़िर में वह अमल जिसे वे निस्बत-ए-उवैसिया का तोहफ़ा कहते हैं: इशा के बाद दुरूद पढ़कर हुज़ूर की सूरत को तसव्वुर में लाना, उनका चेहरा अपने सामने ख़याल करना, अपने दोनों हाथ उठाकर उनके दस्त-ए-मुबारक में दे देना, और फिर बैअत के कलिमात ज़बान से अदा करना।
यानी उसका रास्ता क़ादरी था, और उसका ढंग नज़र का — शरीअत की पाबंदी के साथ, मगर उसका मरकज़ एक तसव्वुर था: हुज़ूर के हाथों में अपने हाथ।
इसके साथ उसका अपना कलाम रखिए। नादिरात-ए-शाही में नअतें हैं, ईद और मीलाद पर नज़्में हैं, और दो सिलसिलों की शान में कलाम है — चिश्ती और क़ादरी। ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेर से, और अब्दुल क़ादिर जीलानी बग़दाद से।
और उसी जिल्द में ब्रज भाषा है — राधा और कृष्ण पर, रागों के हिसाब से दर्ज।
आज रंग खेले आई सकल ब्रज की नारी
यहाँ रुककर एक ज़रूरी सुधार करना पड़ेगा, वरना यह एक सस्ती कहानी बन जाएगी।
यह “समन्वय” या “धर्म-परिवर्तन” नहीं है। शोधकर्ता ऐलिसन बुश का पूरा अध्ययन यही दिखाने के लिए है कि मुग़ल दरबार में ब्रज कोई अनहोनी नहीं थी — अकबर से बहादुर शाह ज़फ़र तक यह सिलसिला लगभग बिना टूटे चला। शाह आलम का ब्रज में लिखना परंपरा से टूटना नहीं, परंपरा में बने रहना है।
तो उसका असल मज़हबी चेहरा यह बनता है: एक ऐसा आदमी जिसने वलीउल्लाही दायरे से तरीक़त माँगी, क़ादरी सिलसिले की बैअत ली, नअतें लिखीं, चिश्ती और क़ादरी दोनों की शान में कहा — और उसी क़लम से, उसी जिल्द में, राग तय करके बरसाने की होली लिखी।
उसमें विरोधाभास नहीं है। उसमें यह है कि दरबारी हिन्दुस्तान में यह सब एक ही आदमी के भीतर बैठ सकता था, और बैठता था।
अनोखी बात रचना नहीं। अनोखी बात तारीख़ है।
अकबर यही रिवायत एक ऐसी सल्तनत के शिखर से चला रहा था जिसकी हद तक निगाह नहीं जाती थी।
शाह आलम वही रिवायत चला रहा था — अपनी आँखें गँवाकर, कंपनी की पेंशन के साये में, एक फटी हुई चाँदनी के नीचे।
उसकी आवाज़
Nadirat-e-Shahi translates literally to “Royal Rarities” or “Rare Gems of the King” written by the 18th-century Mughal Emperor Shah Alam II in 1797.
उसका तख़ल्लुस ‘आफ़ताब’ था। सूरज।
रेख़्ता उसका तआरुफ़ इन लफ़्ज़ों में कराता है: वह मुग़ल बादशाह जिसने लाल क़िले और अपने दरबार में उर्दू शायरी को दाख़िल किया।
उसने फ़ारसी में लिखा, उर्दू में, ब्रज में। उसकी गद्य रचना अजाइब-उल-क़िसस उर्दू नस्र की सबसे शुरुआती कोशिशों में गिनी जाती है।
उसकी सबसे मशहूर उर्दू ग़ज़ल का पहला लफ़्ज़ यह है:
आजिज़ हूँ तिरे हाथ से क्या काम करूँ मैं कर चाक गरेबाँ तुझे बदनाम करूँ मैं
आजिज़ — बेबस, लाचार, हार माने हुए।
रिवायती तौर पर यह इश्क़िया शेर है, महबूब के हाथों बेबसी। मगर कहने वाला वह आदमी है जिसकी ज़िंदगी में यह लफ़्ज़ कभी इस्तिआरा नहीं रहा।
उसी ग़ज़ल से:
है दौर-ए-जहाँ में मुझे सब शिकवा तुझी से क्यूँ कुछ गिला-ए-गर्दिश-ए-अय्याम करूँ मैं
दुनिया के इस चक्कर में मेरी सारी शिकायत सिर्फ़ तुझसे है। मैं ज़माने की गर्दिश का गिला क्यों करूँ।
जिस आदमी को ज़माने की गर्दिश ने शाब्दिक अर्थों में अंधा किया, वह लिख रहा है कि वह ज़माने को इल्ज़ाम नहीं देगा।
हैराँ हूँ तिरे हिज्र में किस तरह से प्यारे शब रोज़ को और सुब्ह के तईं शाम करूँ मैं
और मक़्ते में वह अपने ही नाम से खेलता है — शह-ए-आलम —
मुझ को शह-ए-आलम किया उस रब ने न क्यूँकर अल्लाह का शुक्राना इनआम करूँ मैं
बादशाही मिली, और शुक्रिया तख़्त का नहीं, ख़ुदा का। जैसे वह जानता हो कि तख़्त अब शुक्रिये के लायक़ चीज़ नहीं रह गई।
एक और ग़ज़ल से, जिसमें कोई बादशाहत नहीं, सिर्फ़ हिज्र है:
घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया जी सीने से निकल गया दिल हात से गया
या साल ओ माह था तू मिरे साथ या तो अब बरसों में एक दिन की मुलाक़ात से गया
कभी तू महीनों-बरसों मेरे साथ रहता था, और अब बरसों में एक दिन की मुलाक़ात भी गई।
इसे किसी भी तरह पढ़िए — महबूब, ख़ुदा, या एक गुज़री हुई दुनिया — तीनों पढ़ाइयाँ उस आदमी पर बैठती हैं।
अंधा किए जाने के बाद उससे एक फ़ारसी ग़ज़ल मंसूब की जाती है, जिसका मज़मून यह है कि आँखें छिन जाना दरअसल रहमत हुई, क्योंकि अब यह देखना नहीं पड़ेगा कि कोई ग़ैर उसकी बादशाहत चला रहा है। (उस ग़ज़ल के मतन पर इख़्तिलाफ़ है — सर सैयद ने 1894 में प्रचलित पाठ को ग़लत बताकर दुरुस्त पाठ दिया था। इसलिए उसे यहाँ पूरा नहीं दिया जा रहा।)
मुग़ल बादशाह शाह आलम सानी असल में कौन था?

Tv Actor Rishabh Shukla Played The Role Of Mughal Emperor Shah Alam II In 1994 DD Serial ‘The Great Maratha’
अट्ठत्तर बरस में से छब्बीस उस कमरे में, जिसमें वह पैदा हुआ था। चौदह भागते और हारते हुए। सोलह दिल्ली में, एक ख़ाली ख़ज़ाने और एक क़ाबिल सिपहसालार के साथ जिसे उसने आठ बरस बरबाद किया। अठारह अंधेपन में — जिनमें उसने राग तय किए, अपने रक्षकों का ख़र्च उठाया, दुश्मन को ख़ुफ़िया संदेश भेजा, और दस लाख रुपये जोड़े।
सरकार का फ़ैसला यह है कि वह बेहद कमज़ोर और अस्थिर था — मगर न दग़ाबाज़, न सही सोचने में असमर्थ। कमी सिर्फ़ इरादे की थी। और उसकी वजह वे दो बताते हैं: पहले पचास बरसों की बंजर तंगी, और अफ़ीम की आदत, जिसने इच्छाशक्ति को लकवा मारा मगर अक़्ल पर धुंध नहीं आने दी।
अपनी तमाम बुद्धि, अपने रोज़ के अध्ययन और अपनी परहेज़गारी के बावजूद — यहाँ सरकार का सूखा क़ौस आता है, सिवाय हरम में इज़ाफ़े के — वह सिर्फ़ इस बात का एक और उदाहरण साबित हुआ कि कायर अपनी मौत से पहले कई बार मरते हैं।
यह कठोर है। और यही मानक ऐतिहासिक राय है।
मगर उन “पहले पचास बरसों” को एक बार गिन लीजिए।
और एक आख़िरी बात। महादजी के आने से पहले, जब शाह आलम अपनी सारी उम्मीद उस पर बाँध चुका था, उसने एक मराठा दूत से अपनी दिल की मुराद बताई थी।
कोई फ़तह नहीं। कोई इलाक़ा नहीं। बंगाल वापस नहीं। तख़्त-ए-ताऊस वापस नहीं।
उसने कहा था कि वह बस कुछ दिन चैन से अपनी रोटी खा लेना चाहता है।
वह आदमी, जिसने कभी अपने बाप के हरम के लिए ग़रीबों के लंगर का शोरबा भिजवाया था, तैंतालीस बरस बाद भी वही माँग रहा था।
메타데이터
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