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मुगलों का एक फैसला और पटाखों का त्यौहार बना दीपावली!

बाजारों में रौनक है। घरों में सफाई और सजावट की तैयारियां चरम पर हैं क्योंकि 20 अक्टूबर को भारत ही नहीं पूरी दुनिया में दीपावली मनाई जाएगी।…

Mayank Kumar · 2025-10-18 18:34 · 0 claps · 4.9 min read
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मुगलों का एक फैसला और पटाखों का त्यौहार बना दीपावली!

बाजारों में रौनक है। घरों में सफाई और सजावट की तैयारियां चरम पर हैं क्योंकि 20 अक्टूबर को भारत ही नहीं पूरी दुनिया में दीपावली मनाई जाएगी। जब-जब दीपावली आती है, पटाखों और प्रदूषण की चर्चा शुरू हो जाती है।

ऐसे में एक सवाल मन में आता है कि दीवाली तो दीयों का त्योहार है, तो फिर हम पटाखे क्यों फोड़ते हैं? क्या यह हमेशा से इस त्यौहार की परंपरा का हिस्सा था? या फिर समय के साथ कुछ ऐसा जुड़ गया जो आज सवालों के घेरे में है?

जवाब तलाशने के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने होंगे। इतिहास की वो यात्रा करनी होगी जो चीन के भूत-प्रेत भगाने से शुरू होकर मुगल दरबारों की शाही आतिशबाजी तक जाती है, जिनकी परंपरा को हम आज भी धूमधाम से मनाते हैं।

चीनी रसायनशास्त्रियों की खोज में छिपा था विस्फोटक रहस्य

कहानी शुरू होती है नौवीं शताब्दी के चीन से, जहां ताओवादी रसायनशास्त्री (alchemists) अमरता का अमृत खोज रहे थे। जी हां, कहा जाता है कि वो मृत्यु को हराने का फॉर्मूला ढूंढ रहे थे। उनके प्रयोगशालाओं में तरह-तरह के रासायनिक मिश्रण तैयार किए जा रहे थे।

एक दिन, जब इन रसायनशास्त्रियों ने साल्टपीटर (पोटेशियम नाइट्रेट), सल्फर और कोयले का चूर्ण शहद के साथ मिलाया, तो अचानक भयंकर विस्फोट हुआ। एक प्राचीन ताओवादी ग्रंथ में लिखा है, “इतनी आग लगी कि हाथ और चेहरे जल गए, और पूरा घर जल गया।”

अमरता की खोज में निकले रसायनशास्त्रियों ने अनजाने में मौत का सबसे शक्तिशाली हथियार खोज निकाला था। यह महज एक दुर्घटना नहीं थी, यह मानव इतिहास के सबसे प्रभावशाली आविष्कारों में से एक की शुरुआत थी। बारूद का जन्म हुआ था।

चीनी सैनिकों ने इस मिश्रण को बांस की नलियों में भरकर युद्ध में इस्तेमाल किया। लेकिन जल्द ही इसका उपयोग केवल युद्ध तक सीमित नहीं रहा। चीनी नव वर्ष पर बुरी आत्माओं को भगाने के लिए लाल पटाखे फोड़ने की परंपरा शुरू हुई। चीनी मान्यता थी कि तेज आवाज और रोशनी से नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।

रेशम मार्ग से भारत तक का सफर

तेरहवीं शताब्दी तक, मिंग राजवंश के सैन्य अभियानों और व्यापारिक रास्तों के जरिए बारूद की तकनीक चीन से निकलकर मध्य एशिया, अरब और फिर भारत पहुंची। सिल्क रूट सिर्फ रेशम और मसालों का व्यापार मार्ग नहीं था, यह सभ्यताओं के बीच ज्ञान और तकनीक का पुल भी था।

भारत में बारूद का पहला व्यापक इस्तेमाल 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध में हुआ। बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराने के लिए तोपों और बारूद का धड़ल्ले से उपयोग किया। युद्ध में बारूद की विनाशक शक्ति ने भारतीय सैनिकों को चौंका दिया था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि अगर उस दौर में भारत में पटाखों की परंपरा होती, तो शायद सैनिक इससे इतना नहीं डरते, लेकिन युद्ध के बाद शांति के समय में, यही बारूद उत्सव का माध्यम बन गया।

मुगल दरबार में ‘जश्न-ए-चिरागा’

सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के मुगल काल में दिवाली ने एक नया रूप धारण किया। अकबर, जहांगीर और शाहजहां जैसे बादशाहों ने इस हिंदू त्योहार को अपनी गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा बनाया और इसे ‘जश्न-ए-चिरागा’ यानी दीपों का महोत्सव कहा।

अकबर के शासनकाल में आगरा के किले और फतेहपुर सीकरी में दिवाली की रौनक देखते बनती थी। पूरे महल को दीयों से सजाया जाता था। तीन-चार हफ्ते पहले से साफ-सफाई और तैयारियां शुरू हो जाती थीं। गोवर्धन पूजा के दिन गायों को नहला-धुलाकर, सजाकर सम्राट के सामने लाया जाता था।

जहांगीर ने तो अजमेर में दिवाली मनाने की विशेष परंपरा शुरू की। ‘तुजुक-ए-जहांगीर’ के अनुसार, 1613 से 1626 तक हर साल वे अजमेर के तालाब के चारों किनारों पर हजारों मशालें जलवाते थे। आसमान में 71 तोपें दागी जाती थीं और बारूद से बने विशाल पटाखे छोड़े जाते थे।

शाहजहां के दौर में लाल किले पर ‘आकाश दीया’ की परंपरा शुरू हुई। 40 गज ऊंचे खंभे पर एक विशाल दीपक रखा जाता था, जिसमें 100 किलो से ज्यादा रुई और सरसों का तेल लगता था। इसकी रोशनी लाल किले से चांदनी चौक तक जाती थी। पूजा सामग्री चांदनी चौक के कटरा नील से मंगवाई जाती थी और आतिशबाजी के लिए पटाखे जामा मस्जिद के पीछे के पाइवालान क्षेत्र से आते थे।

मुगल काल में मुस्लिम कारीगरों ने आतिशबाजी निर्माण में अहम भूमिका निभाई। यह केवल एक त्योहार नहीं था, यह सांस्कृतिक सौहार्द और धार्मिक समन्वय का प्रतीक था। रूढ़िवादी उलेमा भले ही इसे गैर-इस्लामी प्रथा मानते रहे हों, लेकिन मुगल बादशाहों ने इसे अपनी शाही परंपरा में शामिल किया।

औरंगजेब: सांस्कृतिक सद्भाव का अंत

लेकिन हर सुनहरे दौर का अंत होता है। औरंगजेब के शासनकाल में यह भव्य उत्सव धीरे-धीरे सिकुड़ता गया। उनकी कट्टर नीतियों ने दिवाली के आयोजन को लगभग औपचारिक बना दिया। हालांकि, जोधपुर के राजा जसवंत सिंह और जयपुर के राजा जय सिंह हर साल दरबार में तोहफे भेजते रहे, लेकिन वह पुरानी रौनक और भव्यता खत्म हो गई।

1667 में औरंगजेब ने गोला-बारूद और पटाखों के उपयोग पर प्रतिबंध तक लगा दिया था, उनका तर्क था कि इससे वातावरण विषैला होता है और संपत्तियों को नुकसान पहुंचता है। दिलचस्प है कि प्रदूषण को लेकर यह चिंता साढ़े तीन सौ साल पहले भी मौजूद थी।

आम जनता तक पहुंचा उत्सव

अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान भी आतिशबाजी का चलन जारी रहा। मराठा पेशवाओं ने भी दिवाली और अन्य उत्सवों पर पटाखे फोड़ने की प्रथा जारी रखी। अवध के नवाब और बंगाल के निजाम ने दुर्गा पूजा और दिवाली एक साथ मनाई, और शानदार आतिशबाजी का प्रदर्शन किया।

धीरे-धीरे जो परंपरा राजमहलों तक सीमित थी, वह आम जनता तक पहुंच गई। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कोलकाता में पहला पटाखा बनाने का कारखाना लगा। 1922 में तमिलनाडु के शिवाकाशी में षणमुगम नडार और अय्या नडार भाइयों ने कोलकाता से माचिस बनाने की कला सीखी और फिर पटाखे बनाने का काम शुरू किया। आज शिवकाशी देश में बनने वाले 80 प्रतिशत पटाखों का निर्माण केंद्र है।

आज का सवाल?

तो 20 अक्टूबर की दिवाली से ठीक पहले यह सवाल फिर प्रासंगिक हो जाता है, दीवाली मूल रूप से दीयों का त्योहार है। यह भगवान राम के अयोध्या वापसी की खुशी में जलाए गए दीपों का प्रतीक है। प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी पटाखों का उल्लेख नहीं है।

पटाखे दरअसल मुगल काल में भारत में लोकप्रिय हुए और धीरे-धीरे हमारी परंपरा का हिस्सा बन गए। यह चीन से शुरू होकर, मध्य एशिया और अरब से होते हुए, मुगल दरबारों में पहुंची एक ऐसी प्रथा है जो आज भारतीय उत्सवों की पहचान बन चुकी है।

लेकिन आज, जब 20 अक्टूबर को देश भर में दिवाली मनाई जाएगी, तब दिल्ली और दूसरे शहर अगले दिन गैस चैंबर बन जाएंगे। सांस के मरीज अस्पतालों में भर्ती होंगे। तब हमें यह सोचना होगा कि क्या हम परंपरा के नाम पर एक ऐसी प्रथा को ढो रहे हैं जो न तो हमारी मूल संस्कृति का हिस्सा थी और न ही आज के दौर में टिकाऊ है।

दीवाली का असली सार रोशनी में है, धुएं में नहीं। अंधकार पर प्रकाश की विजय में है, प्रदूषण में नहीं। शायद यही सबसे बड़ा सवाल है जो आज हमारे सामने है। 20 अक्टूबर की शाम जब आप दिवाली मनाएं, तो एक पल के लिए रुकें और सोचें, क्या यह त्योहार उस रोशनी को फैला रहा है जिसके लिए यह मनाया जाता है, या फिर धुंध और धुएं का परदा डाल रहा है? क्या हम अंधकार पर प्रकाश की विजय मना रहे हैं, या फिर रोशनी को ही धुएं में गुम कर रहे हैं?


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