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Divine Teachings of Shrikrishna Purushottama Siddhanta Upanishad: Hidden Secrets of Vedantic…

Astro Motive: Philosophy, Spirituality & Astrology by Acharya Dr. Chandan

Acharya Chandan · 2025-07-25 18:26 · 0 claps · 5.8 min read
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Divine Teachings of Shrikrishna Purushottama Siddhanta Upanishad: Hidden Secrets of Vedantic Upanishad Wisdom

*Astro Motive: Philosophy, Spirituality & Astrology by Acharya Dr. Chandan*

Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

[embed]Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

क्या आप जानना चाहते हैं कि वह परम सत्ता कौन है जिससे वेद, स्मृति, ऋषि, देवता, यहाँ तक कि स्वयं ब्रह्मा और महादेव भी उत्पन्न होते हैं? क्या आप उस पुरुषोत्तम की झलक पाना चाहते हैं जो त्रिगुणातीत, मायारहित और आनंदस्वरूप है? अगर हाँ, तो यह उपनिषद् आपके लिए है — श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम सिद्धान्त उपनिषद्, जो वैष्णव परंपरा की एक दिव्य कड़ी है और पुरुषोत्तम तत्व का गूढ़तम रहस्य खोलती है। यह कोई साधारण ग्रंथ नहीं, बल्कि एक आत्मानुभूति की यात्रा है, जहाँ दर्शक जानेंगे — जीव, ब्रह्म, शक्ति, शिव और श्रीकृष्ण — इन सबका मूल कौन है और हम सबका चरम लक्ष्य क्या है।

निरंजन, अर्थात जो माया और अज्ञान की कालिमा से सर्वथा परे है, जो निराकार, निर्विकल्प और समस्त उपाधियों से रहित है — उसे मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ। वही पूर्ण आनंदस्वरूप है, वही हरि है, वही मायारहित परम पुरुष है, जिसे पुरुषोत्तम कहा गया है। वह कोई साधारण सत्ता नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि का मूल कारण और चरम लक्ष्य है।

पुरुषोत्तम से ही अष्टावष्टसहस्र रूपों में स्त्रियाँ उत्पन्न होती हैं। स्मृति, जो वेदों की व्याख्या और मानव आचरण की धुरी है, वह भी उसी पुरुषोत्तम से प्रकट होती है। छः शास्त्र, जो धर्म, नीति, कर्मकांड और मोक्ष की राह बताते हैं, वे भी उसी से जन्म लेते हैं। छन्द, जो वेदों की लयात्मकता और उच्चारण की व्यवस्था करता है, वह भी उसी पुरुषोत्तम से उत्पन्न होता है। वेदों का सार — निगम भी उसी पुरुषोत्तम से जन्म लेता है।

प्रजापति, जो समस्त प्रजाओं के रचयिता हैं, वे भी पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न होते हैं। चंद्रमा और सूर्य — जिनकी गति से दिन और रात की लय बनती है — वे भी उसी से उत्पन्न होते हैं। समस्त तीर्थ, जो मनुष्य के पापों का प्रक्षालन करते हैं और आत्मा को पवित्र बनाते हैं, वे भी उसी पुरुषोत्तम से प्रकट होते हैं। परशिव की शक्ति, जो सृजन और लय का मूल है, वह भी उसी पुरुषोत्तम से ही उद्भूत होती है। Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

ऋषि, जो आत्मज्ञान के प्रकाशक हैं, और अनृषि, अर्थात सामान्य ज्ञानीजन — ये सभी उसी पुरुषोत्तम से जन्म लेते हैं। इन्द्र, जो देवताओं के राजा माने जाते हैं, उनका उद्भव भी पुरुषोत्तम से ही होता है। बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र और समस्त देवगण भी उसी परम पुरुष से उत्पन्न होते हैं। देवता, जो विभिन्न प्राकृतिक शक्तियों के अधिष्ठाता हैं, वे सब भी उसी पुरुषोत्तम की ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

सातों समुद्र, जो पृथ्वी पर जीवन के पोषक हैं, वे भी पुरुषोत्तम से ही प्रकट होते हैं। समस्त आत्माएँ — जो इस ब्रह्मांड में चेतना का संचार करती हैं — वे भी उसी पुरुषोत्तम से उत्पन्न होती हैं। मन, और उसकी सहायक समस्त इन्द्रियाँ, जो अनुभव का माध्यम बनती हैं, वे भी पुरुषोत्तम की ही देन हैं। अठारह ब्रह्मांड, जो इस अपार सृष्टि का विस्तार हैं, वे भी उसी पुरुषोत्तम की शक्ति से सृजित होते हैं।

आठ सिद्धियाँ, जो योगियों द्वारा प्राप्त की जाती हैं, और नौ निधियाँ, जो समृद्धि और शक्ति का प्रतीक हैं, वे भी पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न होती हैं। अठारह प्रकार के वनभार — अर्थात वनस्पतियों और औषधियों के समूह भी उसी पुरुषोत्तम की कृपा से उत्पन्न होते हैं। अमृत, जो अमरत्व का प्रतीक है, वह भी उसी से जन्म लेता है। जल — जो जीवन का मूल तत्त्व है — वह भी उसी पुरुषोत्तम से प्रकट होता है। Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

ॐ। शंकराचार्य ने यह उद्घोष किया कि जो निगम अर्थात वेदों का सार है, वही परम सत्य है। इस सत्य का निरूपण पृथ्वी के विभिन्न नामों द्वारा भी किया गया है — गौः, ग्मा, ज्मा, क्ष्मा, क्षा, क्षमा, क्षोणिः, क्षितिः, अवनि, उर्वी, पृथ्वी, मही, रिपः, अदिति, इला — इन सभी नामों के माध्यम से पृथ्वी की महत्ता और उसका ब्रह्मस्वरूप सिद्ध होता है। जीव, जो काल के प्रभाव से रहित, शुद्ध और सत्वगुण सम्पन्न है, वह भी इसी पुरुषोत्तम तत्व का ही अंश है। यहाँ एक रहस्यमय वाक्य आता है — जीवामकालाशूता जीवः — अर्थात जो जीव समय और काल की सीमाओं से परे है, वही वास्तविक जीव है। इसके पश्चात वाक्य आता है — पुष्प एवेदं सर्वम् — यानी यह सम्पूर्ण जगत पुष्पमय है, आनंद और सौंदर्य की अभिव्यक्ति है, जो उसी मातृशक्ति की निष्कल अभिव्यक्ति है, किंतु जब यह शक्ति अपने पूर्ण स्वरूप में नहीं रहती तो विकलता उत्पन्न होती है। अतः इसे यथास्थिति में सप्रेम स्वीकार करना चाहिए।

इस जीव की महिमा यह है कि वह समस्त आयु और समग्र सत्ता में व्याप्त है। उपनिषद् कहता है कि यदि कोई अमृत को किसी भौतिक वस्तु या लोकिक धन में ढूंढता है तो वह भ्रम में है — क्योंकि अमृतत्व केवल आत्मज्ञान और परम तत्व के अनुभव से ही प्राप्त होता है। इसीलिए परम धर्मों की वाणी अग्नि के रूप में प्रकट होती है, जिसे जातवेद कहा गया है। यही अग्नि ब्रह्मज्ञान का उद्घोष करती है। इस ज्ञान में शिव, शक्ति, पशु और जीव — ये चार तत्व उपस्थित हैं। ब्रह्मा, जो सृष्टिकर्ता हैं, यदि वे भक्ति रहित हों तो वे भी केवल एक पशु के समान हैं। केवल वही आत्मा परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकती है जो अपने भीतर की शिवशक्ति को जाग्रत करती है। इस श्लोक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि परशिव ही परम है, और उससे नीचे सभी अवतार — जैसे व्यास, वल्लभाचार्य, श्रीविठ्ठल, हरि आदि — केवल उसी ब्रह्म की लीला रूप अभिव्यक्तियाँ हैं। Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

वर्णन आता है उस दिव्य पुरुष की उपासना पद्धति का — ललाट पर ऊर्ध्वपुण्ड्र, अर्थात ऊर्ध्वरेखा का तिलक, मध्य ललाट पर चंदन अथवा तिलक, जो शुभता का प्रतीक है; शरीर को हरि का मंदिर मानते हुए, हृदय के मध्य कमल में उसकी आराधना करनी चाहिए। कंठ में तुलसी की माला, बाहुओं पर शंख, चक्र और गदा के चिह्न, और गोपीचंदन का लेप — यह सब उपासना की गहनता को दर्शाता है। यह रूप आराधक को जीवोत्तम — अर्थात सर्वोच्च जीव — बना देता है।

यह उपनिषद आगे स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा और शक्ति दोनों ही पुरुषोत्तम से उत्पन्न होते हैं, और महादेव भी उसी पुरुषोत्तम का विस्तार हैं। ॐ। जल — जो अमृतस्वरूप है — उसे भी मर्त्य प्राणी तभी देख सकता है जब वह पुरुषोत्तम तत्व से जुड़ता है। इस पुरुषोत्तम से ही प्राणों की उत्पत्ति होती है, जो समस्त जीवन के वाहक हैं। वही पुरुषोत्तम मन में प्रतिष्ठित होकर, प्राण और प्रज्ञान दोनों का अधिपति बनता है। वह स्वयं में पूर्ण, स्वतंत्र, और त्रिगुणों से रहित है — अर्थात सत्व, रज और तम से परे है। वह श्रीकृष्ण नारायण ही परमात्मा है, वही पुरुषोत्तम है। कैसे? क्योंकि वही पुरुष समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है, और वही सब कुछ है।

इस प्रकार श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम सिद्धान्त उपनिषद की समाप्ति होती है, जो वैष्णव परंपरा में पुरुषोत्तम तत्व के परम रहस्य को उद्घाटित करती है।

तो यह था श्रीकृष्ण पुरुषोत्तम सिद्धान्त उपनिषद् का दिव्य ज्ञान — एक ऐसा रहस्य जो हमें बताता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड, वेद, देवी-देवता, और स्वयं आत्मा भी उसी पुरुषोत्तम से प्रकट हुए हैं। यह उपनिषद् केवल दर्शन नहीं, बल्कि परम सत्य का साक्षात्कार है। यहाँ श्रीकृष्ण केवल एक अवतार नहीं, बल्कि स्वयंसिद्ध पुरुषोत्तम हैं — जो त्रिगुणातीत, परमात्मा और समस्त सृष्टि के कारणस्वरूप हैं। Shri Krishna Upanishad Krishna Upanishad Shrikrishna Philosophy

याद रखिए, आत्मा की जागृति तभी होती है जब आप सही ज्ञान को समय रहते पहचानते हैं। फिर मिलेंगे एक और दिव्य उपनिषद के साथ, तब तक के लिए… ॐ तत् सत्।

This presentation offers a rare and insightful glimpse into the Urdhvapundra Upanishad, an ancient and lesser-known scripture from the Vaishnava tradition of the Vedas. Rooted in Sanatan Dharma and deeply connected to the divine teachings of Lord Shri Krishna, this Upanishad reveals the spiritual science of the Urdhvapundra Tilaka — the sacred vertical mark worn on the forehead by seekers of truth.

More than a symbol, the Urdhvapundra is explained here as a profound representation of Brahma, Vishnu, and Mahesh, embodying the three gunas, the three worlds, and ultimately leading to non-dual Brahman. It details how the Tilaka acts as a gateway to Atma Jnana (Self-Knowledge), Moksha (Liberation), and Paramatma Darshan (Realization of the Supreme Self). This Upanishad also bridges the external symbol with the inner awakening, guiding the seeker from ritualistic devotion to the realization of Sat-Chit-Ananda, the eternal truth of existence.

It’s a spiritual treasure for those exploring Upanishadic wisdom, Krishna Consciousness, Vedic metaphysics, and the inner meaning of Hindu symbols. Watch this if you’re on the path of Advaita Vedanta, Self-Realization, or seeking deeper insights into Vedic science and consciousness.

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