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SIR, वोट चोरी और फ़र्ज़ी वोट — निजी अनुभव

SIR और वोट चोरी पर काफ़ी कुछ घटित हुआ है विगत 1 वर्ष में। केंचुआ के बयानों और RTI के खुलासों से ऐसा ही लगता है कि एक स्वायत्त और संवैधानिक…

Nitesh A · 2026-05-19 14:16 · 0 claps · 2.4 min read paywalled
#sir #2014 #narendra-modi #elections #voting
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Wiki topics: 🏛️ · Politics

SIR, वोट चोरी और फ़र्ज़ी वोट — निजी अनुभव

SIR और वोट चोरी पर काफ़ी कुछ घटित हुआ है विगत 1 वर्ष में। केंचुआ के बयानों और RTI के खुलासों से ऐसा ही लगता है कि एक स्वायत्त और संवैधानिक संस्था को ये सब ऊपर से निर्देशित था।

बात 2014 लोकसभा चुनाव की है — वही चुनाव जिसमें देश ने एक ऐसा बड़बोला चुना जिसके तन और मन की बात अब कोई नहीं सुनता। मेरा उस समय का सबसे प्रिय मित्र जो कि एक कट्टर हिंदू होने की सारी ज़रूरी आवश्यकताएं पूर्ण करता था (उसके कुछ कड़वे निजी अनुभव रहे होंगे और साथ ही आसपास के जाहिल मित्र और रिश्तेदारों का दबाव भी था, सोशल मीडिया इस्तेमाल करना उसे न आता था) । वह दिल्ली में ही पला बढ़ा था बचपन से, पर क्योंकि स्कूल में गुंडागर्दी और आवारागर्दी के कारण पढ़ाई पर कभी ध्यान दिया नहीं तो मेरठ से वकालत की डिग्री के लिए वापस अपने गाँव सरधना की ओर रुख़ करना पड़ा। उसका और उसके परिवार के चारों व्यस्क सदस्यों के वोटर कार्ड दिल्ली में पंजीकृत थे।

पर मेरे विशेषाधिकार प्राप्त मित्र को देश के सारे मुसलमानों को मिटाने के लिए कोई रिक्स नहीं लेने का था। इसलिए उसने अपने संघी मित्रों के साथ मिलकर अपने और अपने परिवार के नाम पर सरधना में फ़र्ज़ी वोट डाले और इधर पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से उसके परिवार ने वैध वोट डाले।

मेरी उससे अक्सर फोन पर बात हुआ करती थी। मैं उस वक़्त UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था और नैतिकता का काफ़ी जोश था मुझमें (जोकि ज़िंदगी की गर्म हवा के थपेड़ों ने अब मद्धिम कर दिया है)। इस moral compass के कारण मैं अपने मित्र से काफ़ी नाराज़ हुआ । वह मेरे उच्च नैतिकता वाले स्वभाव से स्कूल के वक़्त से ही भली भाँति परिचित था। इस पूरे प्रकरण पर मैंने उससे अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की और कहा कि “मैं तुझे अपना प्रिय मित्र कहने में अब शर्म महसूस करता हूँ, मुझे क़ायदे से तो तेरी शिकायत चुनाव आयोग में करनी चाहिए पर मैं बस तुझसे इसकी नैतिकता और औचित्य पर आमने सामने बात करना चाहता हूँ।” उसने कोई भी बात करने से साफ माना कर दिया। मैंने कारण जानने की कोशिश नहीं की — कोई औचित्य ही नहीं था, मुझे ऐसा लगा कि उसके मन में नफ़रत और कुंठा इतनी भर गई है कि उसे अपने प्रिय मित्र के भावनाओं की इतनी भी परवाह भी नहीं कि एक बार खुलकर बातचीत कर सके। आख़िरकार हमारी मित्रता इस मोड़ पर आकर समाप्त हुई। इसलिए नहीं कि महाशय ने एक आतंकवादी को वोट दिया, यह उसका निर्णय है किसे वोट दे किसे नहीं, लेकिन इतनी नफ़रत मन में लिया हुआ एक इंसान जो कि उसकी पूर्ति के लिए किसी भी नैतिक एवं क़ानूनी दीवार को लाँघ सकता है वह भी वकालत की पढ़ाई करते हुए और उसे स्वीकारने या उस पर चर्चा करने की हिम्मत भी न हो उसे मैं कैसे अपने जीवन में रखूं? ये मेरी boundary है जिसे किसी को भी लाँघने की इजाज़त नहीं।

यह तो सिर्फ़ एक नमूना है वोट में धाँधली का वो भी 2014 का। उसके बाद तो कहाँ कहाँ क्या क्या खेला हुआ है यह तो महामानव ही स्वयं जानते होंगे। मुझे पूर्ण रूप से भरोसा है कि आप लोगों के भी ऐसे कुछ अनुभव रहे होंगे विगत 11 वर्षों में, और संघी चाहे जितना मुँह छुपाएँ कुछ तो उनमें से भी शामिल रहे होंगे इस कलाबाज़ी में।


메타데이터
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