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Sairat: जो प्रेम अपराध बन गया

10 अप्रैल 2016 की रात मुझे एक ध्वनि की तरह याद है, दृश्य की तरह नहीं। रात के साढ़े नौ बजने को थे। द कपिल शर्मा शो का हफ़्ते वाला इंतज़ार…

Yash Saxena · 2026-07-09 19:07 · 0 claps · 6.0 min read
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Wiki topics: 🎬 · Film & Television

Sairat: जो प्रेम अपराध बन गया

10 अप्रैल 2016 की रात मुझे एक ध्वनि की तरह याद है, दृश्य की तरह नहीं। रात के साढ़े नौ बजने को थे। द कपिल शर्मा शो का हफ़्ते वाला इंतज़ार अपनी जगह था — वही सोफ़े पर बैठने का तरीक़ा, वही चैनल बदलते हुए आख़िरी बार टाइम देखना। तभी कपिल शर्मा की आवाज़ में एक नाम गूंजा — सैराट, उस साल की सबसे बड़ी मराठी हिट, और उसके साथ मंच पर आई पूरी टीम। उस नाम के गूंजते ही जो सिहरन उठी, उसे आज दस साल बाद भी मैं ठीक-ठीक परिभाषित नहीं कर पाया हूं। फ़िल्म की कहानी का एक शब्द नहीं पता था। फिर भी कुछ भीतर हिल गया था, जैसे किसी ने दूर से एक ऐसी घंटी बजा दी हो जिसकी आवाज़ पहले कभी नहीं सुनी, पर जो फिर भी जानी-पहचानी लगी।

जिस चीज़ ने सबसे पहले छुआ, वह कहानी नहीं थी — वह आवाज़ थी। कलाकारों की सादगी, उनकी बोली की बनावट, और सबसे ज़्यादा अजय-अतुल का वह संगीत जिसने लगभग सम्मोहित कर दिया। “सैराट झालं जी” की धुन में एक बेधड़क ऊर्जा थी जो खुली धूप और मिट्टी की सतह से उठी थी। “आताच बावरे” का कोमल, कांपता हुआ स्वर आज भी उतना ही जादुई लगता है। कहानी को समझने से पहले उसकी ध्वनि समझ आई, और शायद यही सैराट के साथ सबसे गहरी बात हुई — किसी फ़िल्म से पहला परिचय अगर उसकी कहानी से नहीं, उसकी साँस से हो, तो वही फ़िल्म सबसे गहरे तक उतरती है। यह फ़िल्म शुरू से अंत तक ध्वनि की एक यात्रा है, शोर से शुरू होकर एक ऐसी जगह ख़त्म होने वाली यात्रा जहां आवाज़ बचती ही नहीं।

कुछ ही दिनों बाद पूरी फ़िल्म यूट्यूब पर देखी — मराठी में, अंग्रेज़ी सबटाइटल्स के सहारे, रात को अकेले, हेडफ़ोन लगाकर। एक भाषा जो अपनी नहीं थी, फिर भी हर भावना बिना अनुवाद के सीधे पहुंच रही थी। कुछ देर बाद सबटाइटल्स पढ़ना लगभग छूट गया — चेहरे, आवाज़ें, और वह संगीत ही काफ़ी लगने लगे।

शोर, जो धीरे-धीरे छीना जाता है

Actress Rinku Rajguru as ‘Archi’ and Actor Akash Thosar as ‘Parshya’ from Marathi Film Sairaat (2016)

Actress Rinku Rajguru as ‘Archi’ and Actor Akash Thosar as ‘Parshya’ from Marathi Film Sairaat (2016)

फ़िल्म का पहला आधा हिस्सा शोर से भरा है — हंसी, छेड़छाड़, साइकिल की घंटियां, तालाब में कूदने की आवाज़ें। “Zingaat” की बेतहाशा रफ़्तार में पूरा गांव नाचता हुआ महसूस होता है। पर्शा के दोस्त जिस तरह उसे आर्ची को लेकर छेड़ते थे, ठीक वैसी ही छेड़छाड़ अपने दोस्तों के बीच भी होती थी — वही ठहाके, वही गर्मजोशी, वही एक-दूसरे को शर्मिंदा करके हंसना, इतनी सटीक कि परदे और अपनी किशोरावस्था के बीच की दूरी वहीं मिट गई थी।

मंजुले अक्सर अपने कलाकारों को विशाल, खुले खेतों के बीच बेहद छोटा दिखाते हैं — कैमरा दूर से, ऊंचाई से, मानो कोई तीसरा किरदार इन दोनों को देख रहा हो। शुरुआत में यह छोटापन मासूम लगता है, बस दो बच्चे एक बड़ी दुनिया में खेल रहे हैं। बाद में लौटकर सोचें तो वह खुला आकाश भी उस सत्ता-संरचना से छोटा लगने लगता है जो इन दोनों को घेरे हुए है, हर बार जब वह वाइड शॉट लौटता है।

और फिर वह दृश्य आता है जो शायद पूरी फ़िल्म का सबसे साहसी क्षण है। आर्ची को ख़ुद एहसास होता है कि वह पर्शा से प्रेम करने लगी है। वह अपने ही चचेरे भाई से भिड़ जाती है। ठीक उसी क्षण “Sairat Zaala Ji” बजता है। यहां विद्रोह करने वाली पर्शा नहीं, आर्ची है — एक दबंग पाटील परिवार की बेटी अपने ही ख़ून के रिश्ते के ख़िलाफ़ खड़ी होती है, क्योंकि उसका दिल उस सीमा को नहीं मानता जो जाति ने खींची है। पहली बार देखते हुए इसी दृश्य पर ठिठक जाना पड़ा था — हिंदी फ़िल्मों में विद्रोह लगभग हमेशा मर्द करते दिखते हैं, यहां एक लड़की ख़ुद अपने ही परिवार के भीतर खड़ी होकर लड़ रही थी — और बरसों बाद जब अम्बेडकर को पढ़ा, तो यही दृश्य फिर से आंखों के सामने आ गया। उन्होंने जाति के विनाश पर लिखते हुए कहा था कि जब तक अंतर्जातीय विवाह सामान्य नहीं बन जाते, बहिर्विवाह की दीवारें कभी नहीं टूटेंगी, और यह टूटना बाहर से नहीं, उसी समुदाय के भीतर से आना ज़रूरी है जिसे सत्ता से फ़ायदा है। आर्ची का यह एक झगड़ा उसी विद्रोह का बीज लगता है — छोटा, निजी, फिर भी उतना ही बुनियादी। जाति सिर्फ़ पर्शा को नहीं दबाती, वह आर्ची को भी क़ैद करती है, बस एक दूसरी तरह से — उसकी “सही” जगह और “सही” चुनाव पहले से तय करके। जब वह इस क़ैद को तोड़ती है, संगीत अपने चरम पर पहुंचता है। यही फ़िल्म की सबसे ऊंची ध्वनि का पल है, और यही पल उस गिरावट की शुरुआत भी बन जाता है।

“Zingaat” के बाद जब दोनों पकड़े जाते हैं, वह डर आज भी उतनी ही सच्चाई से लौट आता है जितना पहली बार देखने पर था। पेट में उतर जाने वाला वह आतंक, किसी उत्सव के बीचोंबीच अचानक आई सज़ा की आहट। उस दृश्य के बाद वीडियो कुछ पल के लिए रुक गया था, बस सांस लेने के लिए।

शहर, जहां प्रेम को छुपना पड़ता है

Caste Realities in India are honestly shown by Director Nagraj Munjule in the form of a tragic love story

Caste Realities in India are honestly shown by Director Nagraj Munjule in the form of a tragic love story

फिर पर्शा और आर्ची भागते हैं, और फ़िल्म का सुर बदल जाता है। गांव का खुला शोर पीछे छूट जाता है, और उसकी जगह लेती है शहर की अजनबी, अनाम भीड़ की आवाज़ — जहां कोई किसी को नहीं जानता, जो एक तरह से आज़ादी है, पर एक तरह से एक नया क़ैद भी। “Yad Lagla” गाना इसी संक्रमण को पकड़ता है — वह उतना उत्सवधर्मी नहीं जितना “Zingaat” था, उसमें एक हल्की सी उदासी घुली है, जैसे प्रेम अब उत्सव नहीं, ज़िम्मेदारी बन चुका हो। तंगी, छोटा कमरा, दिहाड़ी की मेहनत — यह सब उस उमंग से बिल्कुल अलग दुनिया है जिसमें फ़िल्म शुरू हुई थी। जो लड़की कभी पाटील की बेटी थी, अब घर के सबसे मामूली काम ख़ुद करती दिखती है, और इसी विरोधाभास में एक बात साफ़ हो जाती है — जाति सिर्फ़ इज़्ज़त की व्यवस्था नहीं है, वह सुविधा की भी व्यवस्था है, और जो इसे तोड़ता है, वह अक्सर दोनों एक साथ खो देता है।

यहीं पहली बार समझ आया था कि प्रेम-कहानियां जो “भाग जाने” पर ख़त्म होती हैं, असल ज़िंदगी में वहीं से शुरू होती हैं। फ़िल्म वह हिस्सा भी दिखाने का साहस रखती है जिसे ज़्यादातर कहानियां “और वे ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे” कहकर छोड़ देती हैं।

एक हत्या जो कैमरे से बचती है

The Brutal Climax shown personally disturbed me for a very long time

The Brutal Climax shown personally disturbed me for a very long time

अंत में मंजुले सबसे बड़ा साहस दिखाते हैं। हत्या का क्षण सीधे नहीं दिखाया जाता। कैमरा उस पल से हट जाता है और सिर्फ़ उसके बाद के दृश्य पर टिकता है, मानो वह ख़ुद वह हिंसा देखना नहीं चाहता। इतनी बड़ी क्रूरता दिखाने के लिए किसी नाटकीयता की ज़रूरत नहीं पड़ती, सिर्फ़ उसके बाद बचे खालीपन की।

उस खालीपन को तोड़ती है सिर्फ़ एक आवाज़ — उनके नन्हे बच्चे का रोना, अपने मृत माता-पिता के शरीर के पास। पूरी फ़िल्म में जो ढोल गांव के उत्सवों में लगातार बजता रहा था, यहां जैसे उसकी खाल अचानक फट गई हो — आवाज़ रुकती नहीं, टूटती है, बीच में ही चिर जाती है, और उस चिरे हुए सिरे पर बस एक बच्चे का रोना बचता है। वह रोना पूरी फ़िल्म की सबसे भारी ध्वनि है, क्योंकि वह एक नई आवाज़ है, ठीक उसी जगह जन्म लेती हुई जहां पिछली दो आवाज़ें हमेशा के लिए बुझा दी गई हैं। यह बच्चा उस मौन को विरासत में पा रहा है जिसे उसके माता-पिता ने प्रेम करके तोड़ने की कोशिश की थी। उस दृश्य के बाद काफ़ी देर तक स्क्रीन के अंधेरे में यूं ही बैठे रहना पड़ा — ना वीडियो बंद हुआ, ना कुछ और खुला।

दस साल बाद

आज “Sairaat Zaala Ji” बजते ही वही रात लौट आती है — टीवी की मद्धम रोशनी, वही अनकहा अहसास। पर अब जब वह धुन बजती है, तो मन उस आख़िरी दृश्य पर भी लौट जाता है — उस बच्चे तक, जो अब दस साल का हो चुका होगा अगर वह असली होता। नहीं पता कि उसने कभी अपनी कहानी सुनी होगी या नहीं, कि किसी ने उसे बताया होगा या नहीं कि उसके माता-पिता ने क्यों प्रेम किया और क्यों उसकी क़ीमत चुकाई। शायद उसे यह भी नहीं बताया गया होगा कि जिस दिन उसके माता-पिता को सज़ा मिली, उस दिन उनका असली “अपराध” सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने एक-दूसरे को चुना था। यही सैराट का असली सवाल है — जो पर्दे पर कभी सीधे नहीं पूछा जाता, फिर भी हर बार जब वह गाना बजता है, कहीं भीतर से उठता ज़रूर है।


메타데이터
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