श्रम (मजदूरी) के ऊपर बाबासाहेब अम्बेडकर विचार, डॉ अम्बेडकर भाषण एवं लेखन (BAWS) के माध्यम से
लेखक : गौरव सोमवंशी
श्रम (मजदूरी) के ऊपर बाबासाहेब अम्बेडकर के विचार, डॉ अम्बेडकर भाषण एवं लेखन (BAWS) के माध्यम से
लेखक : गौरव सोमवंशी
मूल स्त्रोत आर्टिकल का हिन्दी अनुवाद : https://www.roundtableindia.co.in/babasaheb-and-labour/

चलिए आज हम 10 उदाहरणों के माध्यम से श्रमिकों के कल्याण के लिए बाबासाहेब डॉ अंबेडकर का योगदान समझते है। यह माहिती अलग अलग प्रकार के सोर्स से ली गई है, लेकिन मुख्य माहिती स्रोत BAWS — Babasaheb Dr. Ambedkar Writings & Speeches ही है। यहाँ पर उल्लिखित अंश अनुरूप स्रोत से लिए गए है, जबकि अतिरिक्त टिप्पणियां इस आर्किटल के लेखक के द्वारा ख़ुद की गई है।
बाबासाहेब और श्रम 1
बाबासाहब अम्बेडकर ने खोती प्रथा को नाबूद करने के लिए क्या किया था, जो मुख्य रूप से कोंकण क्षेत्र में प्रचलित थी :
खोती प्रथा के तहत, खोती अपने किरायेदार से कर / टेक्स एकत्रित करने व उसका कुछ हिस्सा सरकार को देने के लिए बाध्य थे। एक बार भुगतान हो जाने के बाद खोती को अपने किरायेदार के साथ अपनी मर्जी के मुताबिक कुछ भी करने के अमर्यादित स्वतंत्रता प्राप्त थी। सामान्य रूप से खोती इस आज़ादी का ग़लत इस्तेमाल करते थे और अपने किरायेदारो से दुर्व्यवहार करते थे। इसका परिणाम यह था की किरायेदार गरीबी की निम्न स्थिति मे पहुँच गए थे। इसने किराएदारों को आंदोलित कर दिया था। उन्होंने इस अन्यायपूर्ण खोती प्रथा को नाबूद करने की मांग की। खोत और किराएदारों के बीच का संबंध इस प्रकार तनावपूर्ण हो चुका था की, प्रेसिडेंसी मे तीन खोत की हत्या कर दी गई थी, और इसलिए डॉ अंबेडकर ने कहा की इसे खत्म करना जरूरी है।
इस प्रकार डॉ अंबेडकर ने खोती प्रथा को समाप्त करने का विधेयक प्रस्तुत कर जो वास्तविक लोग जमीन को जोत रहे थे उनका शोषण समाप्त करने का और सरकार से उनका सीधा संबंध प्रस्थापित करने का प्रयास किया। इस बिल मे उन्होंने खोती को भी उचित मुआवजा देने के प्रावधान किया। इस प्रकार डॉ अंबेडकर द्वारा खोती प्रथा के नाश के लिए प्रेरित विधेयक भारत मे आजादी के बाद भूमि सुधार कानून का अग्रदूत बना।
संदर्भ : हिन्दी वॉल्यूम 3, पेज 116; चैप्टर 7
https://baws.in/books/baws/HI/Volume_3/pdf/116
बाबासाहेब और श्रम 2
एक मजदूर न केवल समानता चाहता है परंतु उसे स्वतंत्रता की भी आवश्यकता है। वास्तव मे यह असहनीय और हानिकारक है जहा सिस्टम / प्रणाली समानता का प्रस्ताव रखती है लेकिन स्वतंत्रता को नकारती है। जिस संविधान मे इस दोनों का समन्वय प्रस्थापित है, वही संविधान मजदूरों के लिए एक आदर्श संविधान है।
- डॉ बाबासाहेब अंबेडकर
संदर्भ : हिन्दी वॉल्यूम 18, पेज 52; चेपटर 5
https://baws.in/books/baws/HI/Volume_18/pdf/52
बाबासाहेब और श्रम 3
सबसे पहले वह बाबासाहेब ही थे जिन्होंने स्पष्ट आर्थिक शब्दों में यह विश्लेषण किया कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद कैसे शोषणकारी रहा है। उनका शोध निबंध इसी विषय की पुष्टि करता है। नीचे दिए गए शब्द प्रोफेसर एडविन केनन के है, जो उसके शोध निबंध के सुपरवाइजर थे, जो बाबासाहेब से असहमत थे, फिर भी उन्हें निम्न शब्दों में श्रेय दिया की,
मेरे जैसे पुराने शिक्षक मौलिकता की अनिश्चितताओं को सहन करना सीख जाते हैं, तब भी जब वे उन कठिन परीक्षाओं का विरोध करते है जिसके बारे में मिस्टर अम्बेडकर बोल रहे है। ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त पर उनका अध्ययन, शोध कार्य का एक प्रामाणिक और मौलिक टुकड़ा है, जो पहली बार ब्रिटिश शोषण के मुद्दों को उठाता है …”
-Cavnan Edwin “Foreword” in Dr. Babasaheb Ambedkar Writings and Speeches, on Economics, Vol. 6, p. 33, Govt. of Maharashtra, Education Department.
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_12/pdf/26
बाबासाहेब और श्रम 4
बाबासाहेब ने मजदूरों के हड़ताल के अधिकार के लिए क्या किया?
- ‘Industrial Dispute Bill / औद्योगिक विवाद विधेयक’ में व्यावहारिक रूप से मज़दूरों के हड़ताल करने के अधिकार को छीनने की कोशिश की गई थी। बाबासाहेब ने इसका पुरज़ोर विरोध किया। उनके कुछ अंश इस प्रकार हैं:
अब यह कहा गया है कि हड़ताल करना अधिकार जैसी कोई चीज नहीं है। मेरा उत्तर यह है कि ऐसी बात वही व्यक्ति कर सकता है, जो सचमुच में नहीं जानता कि हड़ताल क्या है? अगर सदस्य ‘हड़ताल’ शब्द के मेरे अर्थ को मानने को तैयार है, जो कि सेवा के अनुबंध के उल्लंघन के सिवाए और कुछ नहीं है, तब मैं निवेदन करूंगा कि हड़ताल सिर्फ स्वतंत्रता के अधिकार का दूसरा नाम है। यह किसी भी शर्त पर, किसी की नौकरी की स्वतंत्रता के अधिकार के सिवाए और कुछ नहीं है जिसे कोई भी व्यक्ति प्राप्त करना चाहता है। एक बात और है कि आप स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान कर देते हैं — आप आवश्यक रूप से हड़ताल का अधिकार प्रदान कर देते हैं, क्योंकि जैसा कि मैंने कहा है — हड़ताल करने का अधिकार सिर्फ स्वतंत्रता के अधिकार का दूसरा नाम है।
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_3/pdf/241
इसलिए मेरा मानना है की, हड़ताल को दंडित करना, मजदूरों को गुलाम बनाने के सिवा और कुछ नहीं है। लेकिन गुलामी क्या है? गुलामी को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान मे परिभाषित किया गया है की, गुलामी और कुछ नहीं अनैच्छिक दासता है। और यह अनैच्छिक दासता है। यह नैतिकता और न्यायशास्त्र से विरोधी है।
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_3/pdf/240
प्रश्न यह है कि भारतीय कानून सेवा के अनुबंध के उल्लंघन को अपराध क्यों नहीं मानता है? और भारतीय कानून विशिष्ट निष्पादन के लिए व्यवस्था क्यों नहीं करता है। सदन के अन्य सदस्य जो भी कुछ उत्तर देना पसंद करें, लेकिन मेरा उत्तर तो बड़ा सरल है और वह यह है कि भारतीय विधान-मंडल सेवा के अनुबंध के उल्लंघन को इसलिए अपराध नहीं मानता क्योंकि वह सोचता है कि इसको अपराध मानने का अर्थ है, किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य करना, और उसको दास बनाना। इसलिए मेरा मानना है की, हड़ताल को दंडित करना, मजदूरों को गुलाम बनाने के सिवा और कुछ नहीं है। लेकिन गुलामी क्या है? गुलामी को संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान मे परिभाषित किया गया है की, गुलामी और कुछ नहीं अनैच्छिक दासता है। और यह अनैच्छिक दासता है। यह नैतिकता और न्यायशास्त्र से विरोधी है।
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_3/pdf/233 — औद्योगिक विवाद विधेयक — पूरी चर्चा
बाबासाहेब और श्रम 5
बाबासाहेब का लेखन कि भारत में जाति-पाति आधारित उद्योग कैसे संचालित होते हैं, मिलों के उदाहरण के साथ, और उनके प्रस्तावित समाधान:
बंबई नगर में हमारे यहां ऐसी मिलें हैं, जो पारसियों, गुजरातियों, यहूदियों या यूरोपियनों द्वारा संचालित की जाती हैं। मैं बचपन में इन सब मिलों में गया हूं, क्योंकि मेरे परिवार के कई सदस्य वहां काम करते थे। वहां मैं उनका खाना लेकर जाया करता था।
अभी हाल में भी मैं एक-आध बार कई मिलों में गया था। इन मिलों के बारे में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इन्हें प्रबंधकों के रिश्तेदारों के लिए स्वर्ग बना दिया गया है। हजारों व्यक्ति उनमें उच्च पदों पर निरर्थक कार्यरत हैं और सिर्फ इसलिए क्योंकि वे किसी न किसी रूप में प्रबंधकों से जुड़े हैं। आप पारसी द्वारा संचालित मिल में जाइए, वहां आप देखेंगे कि अनेक पारसी व्यक्ति काम कर रहे हैं, चाहे उनकी जरूरत है या नहीं। गुजराती द्वारा संचालित मिल मे जाइए, वहा आप देखेंगे की अनेक गुजराती वहा काम कर रहे है, चाहे उनकी जरूरत है या नहीं। यहूदियों द्वारा संचालित मिलों में जाइए, वहां आपको सैकड़ों यहूदी नियुक्त मिलेंगे, भले ही वहां उनकी जरूरत हो या नहीं।
कर्मचारियों की कमाई का एक अच्छा हिस्सा प्रबंधक ले लेते हैं, ताकि मिल में काम करने वाले उन लोगों को खिला सकें, चाहे वह कार्यकुशल हैं या नहीं और उन्हें इनकी जरूरत है या नहीं। मिलों को नियंत्रित कर रहे ये सब लोग पूंजी को उड़ा देते हैं और कागजी लिखा पढ़ी से उसे छुपा देते हैं। जब कर्मचारी यह कहता है कि उसे कम मजदूरी मिलती है, तो मिल का नियंत्रण करने वाले लोग कहते हैं, ‘यह मेरी पूंजी है’।
यह सब जाली पूंजी है, शेयर बाजार की पूंजी है, सट्टेबाजों द्वारा लगाई हुई पूंजी है। उद्योगों की कमाई का बड़ा हिस्सा इन लोगों द्वारा उड़ा दिया जाता है और जो थोड़ी बहुत बच जाती है, कर्मचारियों से कहा जाता है कि वे उसी से अपनी आजीविका चलाएं। अगर माननीय प्रधानमंत्री निष्पक्षता लाना चाहते हैं, तो सर्वप्रथम उद्योगों के लाभ के अनुसार कर्मचारियों की मजदूरी में परिवर्तन करना चाहिए।
समझ में नहीं आता है कि मिल मालिक या यूं कहें कि किसी भी उद्योग के किसी मालिक को कानूनी तौर पर अपना वार्षिक बजट क्यों नहीं पेश करने को कहा जाता। प्रत्येक वर्ष सरकार को अपना बजट पेश करना होता है। प्रत्येक वर्ष हमें सरकार का बजट मिलता है, जिसमें सरकार बताती है कि कितने मंत्रियों को लगाया गया है, मंत्री को कितने चपरासी दिए गए हैं, विभाग में कितने निरीक्षक हैं, कितने क्लर्क हैं। ऐसी ही और अन्य बातें बताई जाती हैं। ऐसे में सदन यह समझ सकता है कि संगठन अनावश्यक रूप से बड़ा है या नहीं और धन उचित रूप से व्यय किया गया है या नहीं। मिल मालिक या किसी उद्योग के मालिक को जिससे लाभ मिलता है और जो सिर्फ पूंजी से ही नहीं बल्कि अन्य लोगों के पसीने से भी कमाई करता है, अपने प्रबंध का पूर्ण विवरण देने के लिए बाध्य क्यों नहीं किया जाता? यह बहुत उचित मांग है। इसका लाभ यह होगा कि एक बार किसी उद्योग के मालिक द्वारा इस तरह बजट पेश किया जाएगा तो मजदूर यह महसूस कर सकेंगे और जांच सकेंगे कि मजदूरों में बांटी जाने वाली शेष राशि उन्हें उचित मात्रा में मिली है या कि मालिक ने कुल लाभ का अधिकांश हिस्सा स्वयं ले लिया है? समझौता बोर्ड के होने और मालिक से अपना बही-खाता पेश करने को कहने का क्या फायदा है, जबकि मजदूर को यह जांचने का मौका नहीं दिया गया है कि वास्तव में स्थिति क्या है? अगर मेरे द्वारा प्रस्तावित प्रक्रिया को अपनाया जाता है, तो मुझे यकीन है कि इससे श्रमिक अशांति में कमी होगी, समझौता ज्यादा प्रभावशाली होगा और ज्यादा औद्योगिक शांति कायम होगी। जैसा मैंने सुझाव दिया है, यदि माननीय प्रधानमंत्री उसी तरह श्रम व पूंजी को समानता के आधार पर देखना चाहते हैं और निष्पक्षता चाहते हैं, तो विधेयक के प्रावधानों में इस निष्पक्षता के लिए कोई आधार नहीं है।
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_3/pdf/268
बाबासाहेब और श्रम 6
पूंजी व श्रम के बीच कोई समानता नहीं है, क्योंकि कोई भी विवाद होने पर सरकार मालिक का पक्ष लेती है। यह बात हड़ताल के दिनों में सरकार द्वारा इस्तेमाल किए गए पुलिस बल से स्पष्ट हो जाती है। जनता के चंदे और कर से, जिसे हम सब वहन करते हैं, पुलिस बल चलाया जाता है। यह सब के फायदे के लिए किया जाता है। निस्संदेह, किसी भी सरकार को सिर्फ इसीलिए पुलिस बल का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं है कि मजदूरों द्वारा की गई हड़ताल का परिणाम शांति का उल्लंघन होगा। यह दिखाना भी आवश्यक है कि उद्योग के किसी एक वर्ग विशेष द्वारा शांति भंग की गई है। अगर मजदूरों की किसी अनुचित मांग द्वारा शांति भंग होती है, तो आपका उनके विरुद्ध पुलिस बल का प्रयोग करना न्यायसंगत होगा। यदि दूसरी ओर मालिक के किसी बेतुके, अन्यायपूर्ण और समानता की भावना के प्रतिकूल कृत्य से शांति भंग होती हो, तो सरकार को मजदूरों के खिलाफ पुलिस बल का इस्तेमाल करने का कोई अधिकार नहीं है।
इन दोनों व्यवस्थाओं को मिलाकर ही मालिक व कर्मचारी के बीच सही समानता लाई जा सकती है। मालिक को अपना बजट बताने के लिए बाध्य किया जाए। मात्र शांति भंग होने की स्थिति में सरकार द्वारा पुलिस बल के प्रयोग पर रोक लगा दी जानी चाहिए। इसके बिना पूंजीपति और मजदूर के बीच सौदेबाजी के मामले में शांति और समानता नहीं आएगी। क्या आप ऐसा करेंगे? अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपका और मिल मालिकों का साथ नहीं रहेगा। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, तो आप मजदूर के दोस्त नहीं बन सकते।
मुझे विश्वास है कि विधेयक को इसी रूप में पारित नहीं करना चाहिए। यह मजदूर को केवल अपाहिज बनाता है। हो सकता है कि मजदूर को पता न हो कि यह विधेयक क्या करता है। लेकिन जब विधेयक लागू होगा और मजदूरों का विधेयक से सामना होगा, तो वे कहेंगे कि यह विधेयक बुरा है, खूनी और नृशंस है।
महोदय! मैं इसमें भागीदार नहीं बन सकता। (तालियाँ)
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_3/pdf/269
बाबासाहेब और श्रम 7
कृपया उन लोगों की तुलना करें जो सोचते हैं कि श्रम सामाजिक संदर्भ से स्वतंत्र है, और निम्नलिखित तीन उदाहरणों की तुलना करें जहां बाबासाहेब ने भारतीय समाज का विश्लेषण करने के लिए विशेष रूप से श्रम का उपयोग किया था।
- आज सामाजिक विज्ञान के कई विद्वान जाति व्यवस्था को एक व्यवहारिक समस्या के रूप में चित्रित करने में बहुत समय व्यतीत करते हैं। वे इसे पूरी तरह से अलग करके ऐसा करते हैं। कभी-कभी वे इसे अंधविश्वास के समान श्रेणी में रखते हैं, यह झूठा दावा करते हुए कि “जाति केवल एक तर्कहीन विश्वास है”। यहाँ बाबासाहेब आर्थिक निहित स्वार्थों और श्रम के शोषण के संदर्भ में अस्पृश्यता की व्याख्या कर रहे हैं:
“क्या कारण है कि बुद्धि सामाजिक न्याय नहीं ला सकती? उत्तर है कि बुद्धि तभी काम करती है, जब तक कि किसी के निहित स्वार्थों से उसका टकराव नहीं होता। जहां वह निहित स्वार्थों से टकराती हैं, वहां वह निष्फल हो जाती है। अस्पृश्यता में अनेक हिंदुओं का निहित स्वार्थ होता है। वह निहित स्वार्थ सामाजिक उच्चता का रूप धारण कर सकता है या बेगार और सस्ती मजूरी जैसे आर्थिक शोषण का रूप धारण कर सकता है। अतः यह तथ्य है कि अस्पृश्यता में हिंदुओं का निहित स्वार्थ है। यह स्वाभाविक ही है कि निहित स्वार्थ बुद्धि के आदेश को नहीं मानता। अतः अस्पृश्यों को यह समझ लेना चाहिए कि बौद्धिक कर्म की सीमाएं हैं।”
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_10/pdf/329
- श्रम, धन और शिक्षा को सभी के लिए आवश्यक अधिकार के रूप में देखना।
“जाति, मनुष्य को निर्जीव बनाती है। वह मनुष्य को निष्फल बनाने की प्रक्रिया है। शिक्षा, संपत्ति तथा परिश्रम सभी के लिए आवश्यक है, यदि व्यक्ति एक स्वतंत्र तथा परिपूर्ण मनुष्य बनना चाहता है, संपत्ति एवं परिश्रम के बिना शिक्षा का होना व्यर्थ है। उसी प्रकार शिक्षा तथा परिश्रम के बिना संपत्ति को होना व्यर्थ है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए इनमें से हर चीज आवश्यक है। यह सभी बातें मनुष्य मात्र के विकास के लिए आवश्यक हैं।”
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_6/pdf/95
- श्रम के महत्व को महिमामंडित करने और उस पर पुनः जोर देने के हमारे प्रयासों में, हमें यह पूछना चाहिए कि श्रम (और इस प्रकार, मजदूरों) को सबसे पहले तिरस्कार की दृष्टि से क्यों देखा जाता है :
“जाति व्यवस्था ने जो दूसरी हानि की है, वह यह है कि उसने बुद्धि का कार्य से संबंध तोड़ दिया है और श्रम के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न की है। जाति का सिद्धांत यह है कि ब्राह्मण, जिसे बुद्धि का विकास करने की अनुमति है, उसे श्रम करने की अनुमति नहीं है, वस्तुतः उससे श्रम की हीन मानने की शिक्षा दी जाती है जब किसी शूद्र की श्रम करने की अनुमति है, परंतु अपनी बुद्धि का विकास करने की अनुमकत नही है। इसके जो भयंकर परिणाम हुए, उनका उत्तम चित्र आर.सी. दत्ता ने अंकित किया है….।”
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_6/pdf/95
बाबासाहेब और श्रम 8
श्रमिक की आस्था अंतर्राष्ट्रीयता में है। श्रमिक राष्ट्रीयता में मात्र इसलिए दिलचस्पी रखता है जिससे कि प्रजातंत्र की गाड़ी चलती रहे अर्थात प्रतिनिधि संसद, उत्तरदायी कार्यपालिका, संवैधानिक प्रथाएं आदि राष्ट्रीय मनोभावनाओं से जुड़े समुदाय मं अच्छी तरह काम कर सके। श्रमिक की राष्ट्रीयता किसी लक्ष्य तक पहुंचने का साधन मात्र है। यह अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है जिसके प्रति श्रमिक त्याग करने को सहमत हो क्योंकि उसे ही वह जीवन का सबसे आवश्यक सिद्धांत मानता है।
- ऑल इंडिया रेडियो के मुंबई केंद्र से प्रसारित डॉ. अंबेडकर के भाषण मे से; दिसंबर 1942
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_18/pdf/57
बाबासाहेब और श्रम 9
निम्नलिखित अंश बाबासाहेब ने एक अलग कागज़ पर लिखा था। इसे अंग्रेजी के 12वें खंड में / हिन्दी के 25 वे खंड मे विविध टिप्पणियों के रूप में प्रकाशित किया गया है,
“जिस समाज में कोई प्रतिबंध नहीं है, कोई रुकावट नहीं है, जिस समाज में व्यक्ति को न केवल निर्वाह के साधनों अपितु तंदुरुस्त रहने का भी अधिकार है, जहाँ किसी व्यक्ति को इतना परिश्रम नहीं करना पड़ता कि दूसरे पास सुख-साधनों की भरमार हो, जहाँ किसी व्यक्ति को अपनी क्षमताओं और शक्तियों का विकास करने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाता है ताकि वे अपनों के साथ प्रतियोगिता न कर सकें, जहाँ परिश्रम करने वाले को इनाम मिलता है, जहाँ सभी के प्रति सद्भावना है।”
संदर्भ : https://baws.in/books/baws/HI/Volume_25/pdf/78
बाबासाहेब और श्रम 10
श्री. एच पी सक्सेना (उत्तरप्रदेश) बाबासाहेब से : भगवान आपकी आत्मा की रक्षा करे।
डॉ बी आर अंबेडकर : मेरी आत्मा के लिए प्रार्थना माती कीजिए। मुझमे आत्मा नहीं है। मैं बुद्धिस्ट हु। किसी को भी मेरी आत्मा की रक्षा के लिए तकलीफ लेने की जरूरत नहीं है। मैं भगवान मे विश्वास नहीं करता। मुझमे आत्मा नहीं है।
श्री बी बी शर्मा : आपके भगवान कौन है?
डॉ बी आर अंबेडकर : मेरे लिए जनता ही भगवान है।
메타데이터
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