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जेल की दीपशिखाएँ

मैंने देखा है;

Deepika · 2026-06-04 15:23 · 0 claps · 2.4 min read
#womens-rights #women-empoerment #gender-equality #poertry #life
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Wiki topics: ✊ · Equality & Identity

जेल की दीपशिखाएँ

मैंने देखा है;

स्वर्णिम प्रभात के आँचल में

बँधी हुई कुछ किरणें,

जो स्वयं सूर्य की संतान थीं,

पर अपने ही प्रकाश से

अपरिचित रहीं।

वे चलती थीं

वेतन की रजत पगडंडियों पर,

किन्तु उनके चरणों में

अदृश्य बेड़ियों का संगीत था।

कितना विचित्र है;

उनकी हथेलियों पर

मेहनत की मेंहदी खिलती रही,

पर उसके रंग से

दूसरों के उत्सव सजते रहे।

उनके स्वप्नों की धारा से

ननद के ब्याह के दीप जले,

उनकी साधनाओं के तिनकों से

दूसरों की अट्टालिकाएँ उठीं,

उनकी मासिक चाँदनी से

ईंटों की दूसरी मंज़िलें बनीं;

पर उनके अपने आँगन में

एक छोटी-सी खिड़की तक

न खुल सकी।

वे थीं तो नदी,

पर उन्हें पोखर बना दिया गया।

वे थीं तो मेघ,

पर उनकी वर्षा का अधिकार

किसी और खेत के नाम लिख दिया गया।

आज जब

उनकी गोद का नन्हा पुष्प

पाँच बसंत पार कर आया,

उन्होंने चाहा —

“चलूँ उस नगर,

जहाँ मेरी लिए

ज्ञान के कुछ उजले दीप हों,

जहाँ उसकी आँखों में

क्षितिज कुछ और विस्तृत हो।”

किन्तु उत्तर आया;

जैसे किसी निर्जन वन में

अचानक पत्थर बोल उठे हों;

“जाओगी तो अकेली रहोगी।”

कितनी सहजता से

प्रेम की वीणा को

धमकी का शूल बना दिया जाता है!

कितनी सरलता से

साथ का वचन

एकांत का अभिशाप बन जाता है!

और तब मैं सोचती हूँ;

यह कैसी कैद है

जिसकी दीवारें दिखाई नहीं देतीं?

यह कैसा कारागार है

जिसकी सलाखें

ममता, कर्तव्य, संस्कार और शर्म के फूलों से

गूँथ दी जाती हैं?

बाल्यकाल से ही

एक अनकहा मंत्र

उनके कानों में टपकाया जाता है;

“पढ़ो, ताकि अच्छा घर मिले।”

कोई नहीं कहता;

“पढ़ो, ताकि तुम्हारा मन

आकाश जितना विस्तृत हो सके।”

कोई नहीं कहता;

“उड़ो, ताकि तुम्हारे पंख

अपने लिए भी हवा चुन सकें।”

शिक्षा उनके लिए

ज्ञान का दीप नहीं बनती,

वह बन जाती है

एक वरमाला की पात्रता।

नौकरी उनके लिए

स्वतंत्रता का उत्सव नहीं होती,

वह बन जाती है

स्वीकृति की परीक्षा।

वेतन उनके लिए

आत्मनिर्भरता का गीत नहीं होता,

वह बन जाता है

परिवार नामक साम्राज्य का कर।

और तब

एक स्त्री

जिसके नाम पर बैंक खाता है,

जिसके हाथ में नियुक्ति-पत्र है,

जिसकी मेज़ पर डिग्रियाँ रखी हैं,

फिर भी भीतर से

अपने अस्तित्व की अनुमति माँगती रहती है।

वह कमाती है;

पर खर्च करने से डरती है।

वह निर्णय कर सकती है;

पर निर्णय लेने से डरती है।

वह चल सकती है;

पर हर मोड़ पर

स्वीकृति की बैसाखी खोजती है।

क्योंकि उसकी आत्मा के आँगन में

किसी ने बचपन से

एक बौना दर्पण टाँग दिया था,

जिसमें वह स्वयं को

हमेशा थोड़ा छोटा,

थोड़ा कम,

थोड़ा अधूरा देखती रही।

ओ नारी!

तुम्हारी बेड़ियाँ

लोहे की नहीं हैं,

वे उन वाक्यों की बनी हैं

जो तुम्हें विरासत में मिले;

वे उन चुप्पियों की बनी हैं

जो तुम्हारी माँ ने पी ली थीं,

वे उन समझौतों की बनी हैं

जो तुम्हारी दादी की आँखों में

सूखे कमल बनकर रह गए थे।

तुम्हें कारागार से नहीं,

कारागार की परिभाषा से बाहर आना होगा।

क्योंकि स्वतंत्रता

केवल कमाने का नाम नहीं,

स्वतंत्रता वह क्षण है

जब तुम्हारा अर्जित सूरज

तुम्हारे ही आकाश में उगे,

जब तुम्हारी बेटी

तुम्हारी तरह

अपने अस्तित्व की याचक न बने,

जब तुम्हारी इच्छाएँ

परिवार की चौखट पर

प्रायश्चित न करें।

उस दिन

वेतन पर्ची नहीं,

विजय-पत्र होगी।

नौकरी जेल नहीं,

उड़ान होगी।

और स्त्री;

किसी की कुल्हाड़ी का हत्था नहीं,

स्वयं अपनी दिशा चुनती हुई

एक अनंत दीपशिखा होगी,

जो जलते हुए भी

किसी और के लिए नहीं,

पहले स्वयं अपने अंधकार को

प्रकाश देगी।


메타데이터
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