युवा छात्रों के लिए बाबासाहेब के भाषण (1945 से 1956)
हम 1945 से 1956 के बीच युवाओं और छात्रों को दिए गए बाबासाहेब के भाषणों की सूची प्रकाशित कर रहे हैं, जो मुख्य रूप से शिक्षा पर केंद्रित हैं।…
युवा छात्रों के लिए बाबासाहेब के भाषण (1945 से 1956)
हम 1945 से 1956 के बीच युवाओं और छात्रों को दिए गए बाबासाहेब के भाषणों की सूची प्रकाशित कर रहे हैं, जो मुख्य रूप से शिक्षा पर केंद्रित हैं। आशा है कि आप इस श्रृंखला से बहुत कुछ सीखेंगे। सभी भाषण एक से बढ़ कर एक हैं
1920 से 1945 तक के भाषण प्रकाशित किए गए।
Dr. Ambedkar is delivering his speech in the annual gathering of Elphinston College celebrated at the C. Hall, Bombay on 15th December 1952
अपने कॉलेज का नाम सिद्धार्थ कॉलेज है। यही नाम क्यों रखा गया?…आप जानते हैं कि यह बुद्ध का नाम है, बचपन का। अपना यह सिद्धार्थ कॉलेज भी अभी छोटे बालक समान है।..सिद्धार्थ कॉलेज भी इन्हीं लक्ष्यों का अनुसरण करने वाला है — 1. सत्य को खोज निकालना, 2. मानवता की सीख देने वाले धर्म का ही अनुसरण करना।
मुझे लगता है कि थोड़े रुपए कमाएं और सुख से जिएं के अलावा हमारे प्रोफ्रQेसर्स के मन में और कोई महत्वाकांक्षा ही नहीं है। महत्वाकांक्षा के अभाव में ही उनके हाथों कोई महत्वपूर्ण काम शायद नहीं हो पाता।
अपना आचरण शुद्ध रखते हुए अपने उद्देश्य को पाने के लिए जागरुक रहना होगा। आज की स्थिति में अगर अपनी मनोवांछा पूरी नहीं हुई तब भी हमें उसे प्राप्त करने के संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा।
आपको खूब पढ़ना चाहिए। हर रोज एकाध किताब पढ़ने की आदत आपको डालनी चाहिए। इससे आपका ज्ञान भी बढ़ेगा और आपमें आत्मविश्वास पैदा होगा। अपनी नई इमारत खड़ी हो जाने पर 1000–2000 छात्रों का प्रबंध किया जा सकता है। दिन भर काम कर रात 8 से 10 बजे तक आप पढ़ाई करते हैं यह निश्चित ही प्रशंसनीय है। आप सबको सफ्रQलता मिले यही कामना मैं करता हूं।
कानून का हमेशा धीमे-धीमे विकास होता है। वास्तविक स्थितियों से वह पैदा होता है। इसलिए, हिंदू कोड नए सिविल कोड की पहली पायदान है। इसीलिए आज हिंदू कोड का संहिताबद्ध होना जरूरी है। उसी से हम ‘महत्तम साधारण विभाजक’ निकाल सकते हैं। उसके बाद हम मुसलमान आदि अल्पसंख्यकों के पास जाकर उन्हें इन सुधारों की दिशा के बारे में अवगत कराएंगे
इस व्यवसाय में मर्यादा रखना बेहद जरूरी है उन्होंने आगे कहा- कानून के पंडितों द्वारा आजादी, हेबीअस कॉर्पस और अन्य कामकाज का महत्व जान कर राष्ट्र की सेवा की जानी चाहिए।
सामाजिक पिछड़ापन और सहशिक्षा की गंध भी न होने वाले इस क्षेत्र में लड़कों की बराबरी में लड़कियों को भी शिक्षा देकर इस कॉलेज ने एक नई परंपरा की नींव डाली है। इस कॉलेज में सभी जाति और धर्म की लड़कियां पढ़ रही हैं। लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा मिले और वे बड़ी संख्या में कॉलेज में पढ़ाई करें इसलिए शहर से कॉलेज तक आने के लिए कॉलेज की ओर से एक बस का भी प्रबंध किया गया है। इस कॉलेज के दरवाजे सभी धर्म के बच्चों के लिए खुले हैं। यहां किसी प्रकार जातिवाद नहीं। कॉलेज के प्रोफ्सरों में सभी धर्मों और जातियों के प्रोफ्सर हैं। छात्रों में विद्या, विनम्रता और चरित्र का निर्माण करना कॉलेज का लक्ष्य है।
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हिंदू समाज के बिल्कुल निम्न स्तर से आने के कारण मैं जानता हूं कि शिक्षा का कितना महत्व है। निम्न जाति के समाज की उन्नति का प्रश्न आर्थिक है ऐसा माना जाता है। लेकिन यह बहुत बड़ी गलती है। भारत के दलित समाज की उन्नति करना यानी उनके अन्न, वस्त्र और छत का प्रबंध कर पहले की तरह ही उन्हें उच्च वर्ग की सेवा में लगाना नहीं है बल्कि, जिस कारण से निम्न वर्ग के विकास की राह अवरुद्ध होकर औरों का गुलाम होने पर विवश करने वाली उनकी कुंठा को नष्ट करना है_ वर्तमान समाज व्यवस्था में जिन्हें निर्दयता से लूटा गया है उसका खुद उनके और राष्ट्र के नजरिए से क्या महत्व है इसका उन्हें अहसास कराना है। यही उनकी असली समस्या है। उच्च शिक्षा के प्रसार के अलावा किसी और तरीके से इसे हासिल करना संभव नहीं है। हमारी सभी सामाजिक बीमारियों का मेरी राय में यही एकमात्र इलाज है।
एक सवाल पूछने का मेरा मन करता है कि जिस समाज के बच्चों को आप खुद मुश्किलें झेल कर शिक्षा प्रदान करते हैं क्या कभी यह सोचा है कि शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये बच्चे अपने समाज की उन्नति के लिए क्या करने वाले हैं? क्या आप उनसे कोई प्रतिज्ञापत्र लिखवा रहे हैं? (जवाब ना में मिलने पर) बहुजन समाज की सेवा करने के लिए हमारे बीच से कुछ बच्चे तैयार होने चाहिए इस सोच के साथ मैंने सिद्धार्थ कॉलेज शुरू किया था। लेकिन कटु अनुभव ही मिल रहे हैं। इन बच्चों का व्यवहार ऐसा होता है कि, शिक्षा पाने के बाद कोई बड़ी नौकरी मिली कि बस! हो गया अपना काम! मैं कौन हूं? मुझे किसने शिक्षा-दीक्षा कैसे दी? मुझे शिक्षा देने के लिए उन्होंने कितने कष्ट सहे इस बात का थोड़ा-सा भी अहसास इन बच्चों को नहीं होता। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अपने समाज को भूल जाते हैं। ऐसे लोगों को क्या कहें यही मेरी समझ में नहीं आता।
शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि केवल ज्ञान प्राप्त कर नौकरी पा ले। छात्रों को इस ज्ञान की आराधना कर अपने देश का विकास और उद्धार करना हो तो उन्हें अपने विश्वविद्यालय के कामकाज में जरूर ध्यान देना होगा और अपने हकों के लिए हमेशा लड़ते रहना होगा।
भारत की बहुसंख्य जनता अज्ञान और भोली कल्पनाओं में घिरी है। यहां की समाज रचना ही गलत कल्पनाओं को जन्म देती है।… हमें अपने ज्ञान का उपयोग कर अपने बंधु-बांधवों में सुधार लाना है, उनकी सम्पूर्ण प्रगति के लिए इस ज्ञान का इस्तेमाल करना है। तभी भारत की उन्नति होगी। …..
इस देश में बहुसंख्य लोग अज्ञान और दरिद्रता जीवन जी रहे हैं। उच्च वर्ग हमेशा इस वर्ग को निचोड़ रहा है, इसीलिए मैं कहना चाहता हूं कि, उच्चवर्ग समय रहते जाग जाए और बहुसंख्य अस्पृश्य लोगों की आशा-आकांक्षाओं, भावनाओं को समझें। समय रहते अगर वे चेत नहीं गए, उन्होंने अगर अपने आप को सुधारा नहीं तो उनका विनाश होने में देर नहीं लगेगी।
अधूरी शिक्षा किसी काम की नहीं। परीक्षा में कोई भी उत्तीर्ण हो सकता है। केवल परीक्षा में पास होकर उपाधियां हासिल करने से कोई फायदा नहीं। छात्रों को रचनात्मक कार्य करना होगा। पत्थर तोड़ने और क्लर्की करने में कोई फर्क नहीं है।…इस देश में ब्राह्मण समाज को गलतफहमी थी कि सिफ्रQर् हम ही विद्या प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह सफेद झूठ है…
आप सब लोग विद्या सीखने के लिए आए हैं। लेकिन मेरी राय में केवल विद्या ही पवित्र नहीं हो सकती है। विद्या के साथ भगवान बुद्ध द्वारा बताई गई प्रज्ञा परिपक्वता चरित्र अर्थात् सदाचरण से संपन्न आचरण, करुणा अर्थात् सभी मानव जाति के बारे में प्रेम का भाव और मैत्री अर्थात् सभी प्राणि-मात्र के लिए आत्मीयता ये चार पारमिताएं भी होनी चाहिएं। तभी विद्वत्ता का उपयोग है।
हिंदू संस्कृति को चिरस्थायी रूप देने के लिए पंडित मालवीय द्वारा स्थापित किए बनारस विश्वविद्यालय में दिया गया बाबासाहेब का ऊपर्युक्त भाषण सभी श्रोताओं ने बड़ी शांति से सुना। बाबासाहेब की अधिकारपूर्ण वाणी का और ठोस सवालों का श्रोताओं पर इतना प्रभाव था कि कुछ अनुचित कर सभा को तितर-बितर करने के लिए आगे बढ़े छात्र भी ऐसे स्तब्ध थे मानो उन पर किसी जादू का असर हो।
इस प्रचार पद्धति को अपनाकर ही वेरुल की बौद्ध गुफाओं के पास उन्होंने अपने ब्राह्मण धर्म की गुफाएं उकेरीं। असल में ब्राह्मण गृहस्थाश्रमी। अग्निहोत्र उसका नित्यव्रत। उसे परिमार्जित भिक्षुओं की तरह गुफाओं आदि में रहने की कोई वजह दिखाई नहीं दी। बरसात के तीन महीनों तक किसी सुरक्षित जगह वास करने का बुद्ध का आदेश था। सो उन्हें गुफाओं की आवश्यकता थी। गृहस्थाश्रम में रहने वाले ब्राह्मण को वह नहीं थी। लेकिन बौद्धों की गुफाओं की ओर उपासकों का बड़ा समूह आकृष्ट होता है केवल इसीलिए उनकी गुफाओं के पास ही उन्होंने अपनी गुफाएं उकेर कर अपने धर्म की ओर उपासकों कोखींचने की कोशिश की।
메타데이터
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