वैचारिक संघर्ष से सत्ता के शिखर तक, ऐसा रहा भाजपा के उदय का सफर
भारतीय राजनीति के पन्नों में भारतीय जनता पार्टी का उदय यूँ तो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, लेकिन इसके पीछे दशकों का पसीना और वैचारिक…
वैचारिक संघर्ष से सत्ता के शिखर तक, ऐसा रहा भाजपा के उदय का सफर

भारतीय राजनीति के पन्नों में भारतीय जनता पार्टी का उदय यूँ तो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगता, लेकिन इसके पीछे दशकों का पसीना और वैचारिक तपस्या है। आज जो पार्टी दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में खड़ी है, उसकी नींव संघर्षों की ऐसी ठोस जमीन पर रखी गई थी, जहाँ जीत की उम्मीद कम और सिद्धांतों की रक्षा की चुनौती ज्यादा थी।
इस लंबी यात्रा की शुरुआत अक्टूबर 1951 में हुई। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना उस समय की थी, जब देश की राजनीति पर पंडित नेहरू और कांग्रेस का एकतरफा दबदबा था। वह दौर ऐसा था, जब विपक्ष के पास न संसाधन थे और न ही जनता के बीच उतनी बड़ी पहचान। लेकिन, मुखर्जी का विजन स्पष्ट था, वे भारत को एक ‘सांस्कृतिक राष्ट्र’ के रूप में देखना चाहते थे।
कश्मीर में अलग झंडा और अलग संविधान के खिलाफ उन्होंने एक देश, एक विधान, एक प्रधान और एक निशान का नारा बुलंद किया। 1953 में कश्मीर की जेल में उनकी रहस्यमयी मृत्यु ने जनसंघ को एक बड़ा झटका दिया, लेकिन उनके बलिदान ने पार्टी कार्यकर्ताओं में राष्ट्रवाद की जो आग जलाई, वही आगे चलकर बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत बनी। 1950 और 60 के दशक में जनसंघ ने गौ-रक्षा और हिंदी को बढ़ावा देने जैसे मुद्दों पर संघर्ष किया, जिससे पार्टी की पहचान एक हिंदीभाषी और सांस्कृतिक दल के रूप में बनी।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद का विचार दिया, जिसने जनसंघ को एक ठोस विचारधारा दी। 1967 के आसपास पार्टी ने धीरे-धीरे राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना शुरू की, लेकिन असल बदलाव 1975 में आया, जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगा दी। जनसंघ ने अपनी पूरी ताकत लोकतंत्र बचाने में झोंक दी। 1977 में पार्टी ने राष्ट्रहित के लिए अपनी पहचान को जनता पार्टी में विलीन कर दिया और पहली बार केंद्र में सत्ता का हिस्सा बनी।
अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता सरकार में शामिल हुए, लेकिन यह साथ ज्यादा दिन नहीं चला।
दोहरी सदस्यता यानी आरएसएस के साथ संबंध के मुद्दे पर विवाद हुआ और जनसंघ के नेताओं ने सत्ता को ठोकर मारकर अपनी विचारधारा को चुनना बेहतर समझा।
6 अप्रैल, 1980 को बीजेपी का जन्म इसी वैचारिक अडिगता का नतीजा था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पार्टी ने गांधीवादी समाजवाद की राह पकड़ी। लेकिन, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी लहर ने बीजेपी को महज 2 सीटों पर समेट दिया। यह पार्टी के लिए सबसे अंधकारमय दौर था। हार इतनी बड़ी थी कि कई जानकारों ने बीजेपी के खत्म होने की भविष्यवाणी कर दी थी। लेकिन, यहाँ से लालकृष्ण आडवाणी ने कमान संभाली और पार्टी ने महसूस किया कि उसे अपनी कोर विचारधारा यानी प्रखर हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की ओर लौटना होगा।
90 का दशक वह मोड़ था, जहाँ से बीजेपी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1989 के पालमपुर अधिवेशन में राम मंदिर निर्माण का संकल्प लिया गया। आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या की रथ यात्रा ने देश के सियासी भूगोल को बदल दिया। हिंदुत्व के इस उभार ने बीजेपी को 1991 में 120 और 1996 में 161 सीटों तक पहुँचा दिया। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी का युग आया, जिन्होंने 5 साल तक 24 दलों को साथ रखकर दिखा दिया कि बीजेपी गठबंधन चलाने और सुशासन देने में भी उतनी ही माहिर है।
2014 के बाद की कहानी भी किसी से छिपी नहीं है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने विचारधारा के साथ-साथ विकास और गरीब कल्याण का जो मॉडल पेश किया, उसने उसे अजेय बना दिया। अनुच्छेद 370 का खात्मा और राम मंदिर का निर्माण जैसे दशकों पुराने वादों को हकीकत में बदलना मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। उज्ज्वला से लेकर डिजिटल इंडिया तक की योजनाओं ने पार्टी को उन गरीबों से जोड़ दिया, जो कभी कांग्रेस का वोट बैंक हुआ करते थे।
जनसंघ से बीजेपी तक का यह सफर, राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ रखने वाले युवाओं को यह सिखाता है कि राजनीति सिर्फ चुनाव जीतना नहीं, बल्कि अपनी सोच पर टिके रहना भी है। 1951 के एक छोटे से कमरे से शुरू हुआ यह आंदोलन आज लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर एक नया कीर्तिमान रच चुका है। यह सफलता संगठनात्मक मजबूती, स्पष्ट विजन और अटूट नेतृत्व का परिणाम है। वो नेतृत्व जो कभी अटल-आडवाणी में देखने को मिला, और आज मोदी-शाह उसकी कमान संभाले हुए हैं।
메타데이터
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