पर, परंतु, किंतु, लेकिन
प्रसंग
पर, परंतु, किंतु, लेकिन
प्रसंग

मुझे यकीन था
इसलिए मैंने इंतजार किया
मेरी सहेलियाँ मुझे अक्सर पूछती हैं
कहा रहती हो आजकल?
बहुत दिनों से दिखाई नहीं दी..
कह तो मैं भी दू
कि मैं दिखती नहीं हूँ
और तुम हाल भी नहीं पूछते
कैसे शुभचिंतक हो?
मिलना तो खेर वाजिब भी नहीं लगता अब
क्योंकि गलियारे सूने रह गए
कोई आया ही नहीं ढूँढते!
हताश?
वो क्या होता है?
हताश, निराश,
बिलखते से, सुलगते से
अपनी चार दीवारी में कैद है
कैद सुकून भरी है लेकिन
सुकून भरी. . .
पर, परंतु, किंतु, लेकिन
मैं समझ पायी अब
तुम हाल जानने में दिलचस्प नहीं
मैं भी दिन गिन रही हूँ अंत के
तुम बस इस बेबस के वैराग्य को टटोलने आयी हो
कितनी पत्थर दिल हो
क्रूरता की एक हसीन मूर्ति हो
मेरी पीड़ा एक लंबी पीढ़ी की देन है
मैं एक हीन हूँ,
बरसों मिल रही पीड़ा के अधीन हूँ
This story is published under “Writer’s Circle.” A space for raw thoughts, everyday fictional, Non-fictional stories, and voices that feel real and relatable. Would you like to contribute? Follow our publication. Have a story to tell? Share it with us here.”
메타데이터
- post_id
- a5a5dfcf0752
- slug
- पर-परंतु-किंतु-लेकिन-a5a5dfcf0752
- url
- https://medium.com/writers-chaupal/%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%81-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8-a5a5dfcf0752
- canonical_url
- https://medium.com/writers-chaupal/%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%81-%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%81-%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A4%BF%E0%A4%A8-a5a5dfcf0752
- author_url
- https://medium.com/@Brookink
- status
- ok
- fetched_at
- 2026-06-16 19:09:56