आज़ादी की लड़ाई में मंगल पांडे और भगत सिंह का योगदान
भारत की आजादी की लड़ाई India’s freedom struggle में लाखों लोगों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और इनमें कुछ ऐसे भी लोग थे, जो महायानक थे और जो एक नई…
आज़ादी की लड़ाई में मंगल पांडे और भगत सिंह का योगदान

भारत की आजादी की लड़ाई India’s freedom struggle में लाखों लोगों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया और इनमें कुछ ऐसे भी लोग थे, जो महायानक थे और जो एक नई प्रतिमा के साथ उभरे। अगर देश 15 अगस्त, 2022 को अपनी आजादी के 75 साल India’s 75 years of Independence पूरा कर रहा है और इसी उपलक्ष में पूरा देश आज़ादी का अमृत महोत्सव ‘Azadi Ka Amrit Mahotsav मना रहा है तो उसका कारण है वे स्वतंत्रता सेनानी Freedom Fighters, जो देश की आज़ादी के लिए लड़े, कई यातनाएं सहीं, लाठियां खाईं लेकिन देश को कभी झुकने नहीं दिया,और अपने प्राणों की आहुति दे कर हमें स्वतंत्र किया।
कुछ आरज़ू नहीं है, है आरज़ू तो बस यह,
रख दे कोई ज़रा सी खाके वतन कफन में।
खाके वतन का अर्थ वतन की मिट्टी है।
स्वतंत्रता सेनानियों के लिए उनका जीवन, उनका परिवार, उनके दोस्त, उनकी खुशी से कहीं ज्यादा ज़रूरी देश को आज़ाद करना था। देश को आज़ाद करने में उन्होंने अपनी जान तक की परवाह नहीं की और हंसते-हंसते अपने प्राण दे दिए। अगर आज हम सब एक स्वतंत्र देश में रहने का आनंद ले रहे हैं तो ये स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान Struggle of Freedom **Fighters** की वजह से मुमकिन हो पाया है।
आज हम आपको भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दो खास महानायक- मंगल पांडे और भगत सिंह के बारे में बताएंगे, जिनकी वजह से आज देश आज़ाद है।
Role of Mangal Pandey and Bhagat Singh in Freedom Struggle
मंगल पांडे Mangal Pandey
मंगल पांडे Mangal Pandey का जन्म 19 जुलाई,1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। उनकी मां का नाम अभय रानी और पिता का नाम दिवाकर पांडे था। ईस्ट इंडिया कंपनी East India company की स्वार्थी नीतियों के कारण मंगल पांडे को अंग्रेजी हुकुमत से बहुत नफरत थी। सन् 1849 में वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए थे और बैरकपुर की सैनिक छावनी में बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की 34वीं रेजीमेंट के पैदल सेना के सिपाही रहे। बंगाल यूनिट में एनफील्ड पी.-53 राइफल में जब नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू किया गया तो कहीं से एक खबर सैनिकों के बीच फैल गई। खबर ये थी कि कारतूसों को बनाने में सूअर और गाय की चर्बी का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह एक गंभीर विषय था क्योंकि हिंदू धर्म में गाय को मां समान माना जाता है वहीं मुस्लिमों में सूअर वर्जित होता है। दिक्कत ये थी कि नई बंदूक में कारतूस को दांत से काटना पड़ता था। सैनिकों ने नए बंदूकों को इस्तेमाल करने से साफ मना किया। जब 9 फरवरी, 1857 को यह कारतूस सैनिकों को बांटा जा रहा था, तो मंगल पांडे ने उसे लेने से साफ-साफ मना कर दिया।
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메타데이터
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