घर से दूर… और यादों के और करीब!
घर पर रहने की कीमत तब समझ आती है, जब आप घर से बाहर रहकर पहली बार बीमार होते हैं। जब घर का सिर्फ़ एक सदस्य भी बीमार होता है, तो पूरा परिवार…
घर से दूर… और यादों के और करीब!

घर पर रहने की कीमत तब समझ आती है, जब आप घर से बाहर रहकर पहली बार बीमार होते हैं। जब घर का सिर्फ़ एक सदस्य भी बीमार होता है, तो पूरा परिवार उसकी देखभाल में जुट जाता है। जैसे कोई मिशन हो जिसमें हर किसी का एक अलग, पर उतना ही ज़रूरी योगदान होता है।
एक तरफ़ पापा सबसे पहले अपनी दवाइयों का पिटारा खोलते हैं, जैसे कोई एक्सपर्ट फार्मासिस्ट, जो हर तकलीफ़ का तुरंत इलाज ढूंढ ले। वहीं दूसरी तरफ़ मम्मी अपने देसी नुस्खों के साथ तैयार रहती हैं — अदरक वाली चाय, हल्दी वाला दूध, और किसी चमत्कारी काढ़े की तैयारी शुरू। साथ ही, कुकर की सीटी सुनाई देने लगती है, जिसमें गरमा-गरम खिचड़ी बन रही होती है।
और फिर वो छोटी-छोटी बातें जो सिर्फ़ घर पर ही महसूस होती हैं — बहन का चुपके से चॉकलेट रख देना, कभी बिना कहे पानी का गिलास पास रख देना, फिर रात को सोते समय धीरे से पूछ लेना, “अब थोड़ा ठीक लग रहा है?” बस, उसी वक्त समझ आता है कि बहन की छुपाने वाली मोहब्बत कितनी गहरी होती है।
मैं पिछले 5 साल से घर पर थी और कई बार बीमार पड़ी, पर इन बातों पर कभी इतनी बारीकी से ध्यान तब ही गया जब मैं हाल ही में दूसरे शहर शिफ्ट हुई। तबियत खराब हुई तो उठकर गरम पानी लेना भी एक बड़ा टास्क लगा, बिना पापा के डॉक्टर के यहाँ जाना अजीब लगा, और मम्मी के बिना नुस्खे आज़माना तो और भी मुश्किल।
पर इसी अकेलेपन में एक अनदेखा सा साथ भी महसूस हुआ — घर की यादों का। वही यादें जो अब सिर्फ़ दिल को तसल्ली नहीं देतीं, बल्कि हर मुश्किल में जैसे अंदर से थाम लेती हैं।
ये यादें अब एक तरह की ताकत बन गई हैं। ऐसा नहीं कि सब आसान हो गया है, लेकिन अब जब खुद से खिचड़ी बनाती हूँ, तो मम्मी की बताई हर बात और बहन की चुपके से रखी चॉकलेट याद आ जाती है। और हर बार थोड़ा एक्स्ट्रा बना लेती हूँ — जैसे घर का एक हिस्सा मेरे साथ टेबल पर बैठा हो।
वही हिस्सा जो मुस्कुराकर कहता है,
“**तू सब संभाल लेगी।”** 메타데이터
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- 2026-07-20 10:03:26