द्वंद्व
द्वंद्व
एक बच्ची थी बहुत छोटी और मासूम , जो इस दुनिया की असलियत से कोसों दूर थी,
वो बस जानती थी तो अपने घर वालो को जिनके साथ वो हमेशा हर पल बिताती थी या फिर शायद उन्हें भी नहीं... कहां मालूम थे उसे इस दुनिया के तौर-तरीके , कहां मालूम था उसे कि एक ही इंसान के कई चेहरे भी हो सकते हैं... वो थी अपनी मस्ती में मस्त बड़ी ही निश्छल सी सयानी सी...
दुनिया में अभी उसने कदम रखा ही था शायद लड़खड़ा कर चलना जान गई थी लेकिन संभल कर सीधे चल पाना अभी भी सीखना बाकी था... बाकी था सीखना लोगों को समझना... बाकी था सीखना चेहरों को पढ़ना... बाकी था सीखना सही क्या है गलत क्या है ये पहचानना
हर दिन की तरह आई थी स्कूल से घर हँसती खेलती हुई, हर दिन की तरह उसके किस्से सबको सुनाना... लेकिन शायद वो दिन इतना भी हर दिन की तरह नहीं था...
कहानी है 8 साल की एक लड़की की नाम था मुक्ति, मुक्ति अपने नाम को हर तरह से सिद्ध करती थी पढ़ने में बहुत होशियार और स्वभाव में चंचल । मेडल्स तो उसके इतने कि जगह ही कम पड़ जाती लेकिन उनकी गिनती कभी नहीं रुकती थी। उसका बात-बात पे बाहर किसी से झगड़ के आ जाना ये तो मानो हर रोज़ की ही बात थी , ये उसके स्वभाव और मज़बूत इरादों को अच्छे से दर्शाता था , उसे शायद अच्छे से पता था कि वो कहाँ सही है और अगर वो गलत नहीं है तो कभी नहीं झुकेगी.…. मैंने कहा "शायद" हाँ शायद।
क्यूंकि सही-गलत का फर्क वो कभी घर पे नहीं कर पायी क्यूँ?? जवाब तो पता नहीं , या फिर शायद उसे लगा होगा कि यहाँ तो मैं महफूज़ हूँ मुझे यहाँ किसी से क्यूँ ही डरना, क्यूँ ही सतर्क रहना,
क्यूँ ही इतना ध्यान रखना, क्यूंकि शायद ये सब तो बाहर की दुनिया में रखना पड़ता है ना? अभी तक तो उसे यही पता था।
सर पर पड़े हर हाथ को वो आशीर्वाद समझती थी और समझे भी क्यूँ ना शायद वो आशीर्वाद ही होगा,
पीठ पर पड़े हर हाथ को वो प्यार की थपकी समझती थी और समझे भी क्यूँ ना शायद वो प्यार से किया हुआ उत्साहवर्धन ही होगा,
ललाट पर जितनी बार भी चूमी गई उसने प्यार ही समझा और समझे भी क्यूँ ना शायद वो प्यार ही होगा,
उसके शरीर पर सहलाया गया हर हाथ उसने एक कवच ही समझा और समझे भी क्यूँ ना शायद वही उसकी ढाल होगा,
उससे किए गए हर आलिंगन को उसने साथ होने का एहसास दिलाना ही समझा और समझे भी क्यूँ ना शायद वो यही होगा,
उसे पता था कि घर से महफूज़ जगह और कोई नहीं है या फिर शायद ही पता था......
अगर कभी उसे कुछ असहज भी करता तो वो सोचती कि ये तो मेरा "घर" है यहाँ पे क्यूँ ऐसा सोचना? यहाँ तो सब मेरा ध्यान रखते हैं मुझे इनसे कैसा डरना?
लेकिन वो सीमायें कब धूमिल पड़ती गयी वो समझ ही नहीं पायी...
नहीं समझ पायी कि वो प्यार नहीं , प्यार का मुखौटा था जिसके पीछे कोई दानव था जो नोच लेना चाहता था उसका बचपन, दानव भी नहीं शायद दरिंदा ही कहेंगे क्यूंकि दानव में भी तो थोड़ा इंसान होता ही है...
जिसे वो अपना घर समझती थी जहाँ थक जाने पर आकर उसे सुकून मिलता था वो जगह अब उसे डराती है, उसके बाल मन को कलंकित करती है, उसे लग रहा था कि गलत हो रहा है लेकिन वो तो उसका अपना परिवार था वो कैसे गलत कर सकता है ? उसे खुद के पास किसी और के सांसों की आहट भी भयभीत कर देती है।
अपने आप को सवालों के घेरे में खड़ा पाकर वो सोचती है — किसे कहे वो किसे बताए ,पता नहीं, कोई उसकी मदद भी करेगा? या उसे मजबूर कर दिया जाएगा इस बात को दबा कर रख लेने या भूल जाने को ? पता नहीं,
लेकिन सबसे बड़ा सवाल क्या उसे आवाज़ उठानी चाहिए? वो सही भी है या नहीं, पता नहीं….
उसके मासूम से बचपन की चादर पर एक गहरा दाग लग गया था जिसे हटा पाना अब मुश्किल था।
आज वो बड़ी तो हो गयी है लेकिन उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा पछतावा उसे आज भी झकझोर कर रख देता है,
आज वो बड़ी हो गयी है, दुनियादारी भी सीख गयी है लेकिन बचपन की वो याद , वो सच उसे आज भी कचोटता है,
हाँ मैंने कहा "सच"
आज वो बड़ी हो गयी इसलिए वो जान गयी कि वो सही थी और बाकी सब गलत,
आज वो बड़ी हो गयी है और जान गयी है चलना बिना किसी सहारे के, उसने खुद के और दुनिया के बीच के इस सफर में मीलों दूर तक चल कर देख लिया लेकिन अंधेरे में आज भी उसके पांव की गति धीमी पड़ जाती है ।
आज वो जान गयी है हर मुखौटे के पीछे छिपे सच को।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल,
वो पा सकेगी मुक्ति अपने अंदर बैठे उस डर से?
कर पाएगी अपने नाम का यथार्थ साबित ?
कर पायेगी विजय हासिल उस खौफनाक याद से?
क्या भर पाएगी मुक्त गगन में एक स्वच्छंद उड़ान?
शायद तब तक नहीं जब तक वो उसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा लेती ।
उसके अंदर का ये पश्चाताप कैसे दूर होगा?
अब उसे खुद ही लड़ना होगा , मुक्ति है वो पर अब उसे खुद को ही आजाद करना होगा।
As per UNICEF, Globally, nearly 1 in 5 women have experienced sexual abuse during childhood .
According to the National Crime Records Bureau (NCRB) over 96% of rapes are committed by people known to the victim.. yes you read it right 96%
According to delhi police data, 44% of rape victims identified the accused as a family member.
what a wonderful world we’ve built for our children. In 2020, we managed to record 477,221 cases of crimes against them. That’s about 1,307 cases every single day, or 54 every hour. Basically, every 67 seconds ...faster than it takes to boil water another child is being hurt. But don't worry because out of all those cases, only 0.95% actually resulted in a conviction. That means if someone hurts a child, they have a 99% chance of getting away with it. We are clearly doing a great job.
And in reality, the number of these cases is very high because most cases are not even reported... Due to a lack of awareness, Due to fear of society, Due to fear of disgrace.
메타데이터
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- 2026-07-07 18:25:49