किसी काम का नहीं रहा UN, जल्द होगा संस्था का अंत!
उस दिन लंदन की सर्द हवाओं में कुछ लोग एक मेज़ के चारों ओर बैठे थे। दुनिया अभी-अभी द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से उभरी थी। लाखों लोग मारे…
किसी काम का नहीं रहा UN, जल्द होगा संस्था का अंत!

उस दिन लंदन की सर्द हवाओं में कुछ लोग एक मेज़ के चारों ओर बैठे थे। दुनिया अभी-अभी द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही से उभरी थी। लाखों लोग मारे जा चुके थे, शहर खंडहर बन चुके थे, और इंसानियत की नब्ज़ कमजोर थी। सवाल सिर्फ़ इतना था, क्या मानवता फिर कभी ऐसी बर्बादी देखेगी?
इसी सवाल के बीच से जन्म हुआ उस संगठन का, जिसे हम आज संयुक्त राष्ट्र (UN) कहते हैं। UN वो संस्था जिसका निर्माण दुनिया में चल रहे नरसंहार को रोकने के लिए हुआ था लेकिन आज ये इस मोर्चे पर फेल होता दिख रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या ये संस्था अपने अंत के निकट है?
संयुक्त राष्ट्र क्या है और क्यों बना?
संयुक्त राष्ट्र एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को हुई थी। इसका मकसद था दुनिया में शांति बनाए रखना, युद्धों को रोकना और देशों के बीच सहयोग बढ़ाना। इससे पहले इसी तरह का एक संगठन था, लीग ऑफ नेशंस, लेकिन वह द्वितीय विश्व युद्ध को रोक पाने में पूरी तरह नाकाम रहा। इसलिए उसकी जगह UN आया।
नामकरण किसने किया?
“United Nations” नाम अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने सुझाया था। यह नाम पहली बार 1942 में मित्र देशों (Allies) की घोषणा में इस्तेमाल हुआ था।
UN का ढांचा और विभाग
आज UN एक बहुत बड़ा नेटवर्क है। इसके छह मुख्य अंग (Organs) हैं –
महासभा (General Assembly)
सुरक्षा परिषद (Security Council)
आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC)
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)
सचिवालय (Secretariat)
न्यास परिषद (Trusteeship Council) — (यह अब निष्क्रिय है)
इसके अलावा WHO, UNESCO, UNICEF, UNHRC जैसे दर्जनों विशेष संगठन और एजेंसियां हैं।
पहला केस कौन सा था?
UN की सुरक्षा परिषद के सामने आने वाला पहला मामला 1946 में ईरान संकट (Iran Crisis) था। इसमें सोवियत सेना ने ईरान से बाहर निकलने से इनकार किया था। UN ने दबाव बनाया और आखिरकार सोवियत सेना को ईरान छोड़ना पड़ा। इसे UN की शुरुआती सफलता माना गया।
कितने केस चले और क्या हल हुए?
संयुक्त राष्ट्र के सामने अब तक हजारों छोटे-बड़े मामले आए। कुछ जगह उसने शांति स्थापित की (जैसे पूर्वी तिमोर, नामीबिया), लेकिन कई जगह विफल रहा, खासकर कश्मीर, फिलिस्तीन, रवांडा नरसंहार, सीरिया और यूक्रेन युद्ध में। कई बार समाधान हुआ, लेकिन कई मामले दशकों से पेंडिंग हैं।
कश्मीर का मामला क्यों अटका हुआ है?
1947 में भारत-पाक युद्ध के बाद पंडित नेहरू ने कश्मीर का मामला UN में ले जाकर अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप मांगा। यह कदम आज भी बहस का विषय है। UN ने जनमत संग्रह की बात की, लेकिन भारत ने समय के साथ इसे न मानते हुए कश्मीर को आंतरिक मामला घोषित किया। पाकिस्तान ने इसे कभी नहीं माना। नतीजा यह हुआ कि कश्मीर का विवाद आज भी UN की किताबों में दर्ज है, लेकिन हल नहीं हो पाया।
क्या यह नेहरू की गलती थी?
इतिहासकार मानते हैं कि नेहरू की मंशा शांति चाहने की थी, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से पाकिस्तान के खिलाफ मामला अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाना भारत के हित में नहीं रहा। कई लोग इसे नेहरू की बड़ी भूल मानते हैं।
UN क्यों युद्ध नहीं रोक पाता?
यहां सबसे बड़ी दिक्कत है Veto Power। सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन को वीटो अधिकार है। यानी अगर इनमें से कोई एक भी विरोध कर दे, तो प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। यही वजह है कि सीरिया से लेकर यूक्रेन और गाज़ा तक, हर जगह वीटो के कारण कार्रवाई रुक जाती है।
क्या UN खत्म हो जाएगा?
कई लोग कहते हैं कि अगर UN अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रहा तो उसकी अहमियत घटती जाएगी। लेकिन दुनिया के पास अभी UN का कोई विकल्प भी नहीं है। इसलिए यह पूरी तरह खत्म नहीं होगा, बल्कि समय-समय पर अपने ढांचे में बदलाव कर सकता है।
असफलता के कारण
वीटो पावर की राजनीति
देशों का स्वार्थ और शक्ति संतुलन
फैसलों का लागू न होना
वित्तीय कमी और शक्तिशाली देशों पर निर्भरता
आतंकवाद और नए प्रकार के युद्धों को लेकर स्पष्ट नीति का अभाव
भारत क्यों स्थायी सदस्य नहीं बन पाया?
भारत आज सबसे बड़ा लोकतंत्र है, दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और UN की शांति सेनाओं में सबसे बड़ा योगदान देता है। फिर भी वह स्थायी सदस्य नहीं बन पाया। कारण हैं:-
चीन का विरोध
अमेरिका और उसके सहयोगियों का भू-राजनीतिक स्वार्थ
UN में सुधार पर सहमति न बन पाना
भारत को वीटो पावर क्यों नहीं मिला?
वीटो पावर केवल 1945 में बने स्थायी सदस्यों को मिला। बाद में किसी नए सदस्य को यह अधिकार नहीं दिया गया। भारत को कई बार प्रस्तावित किया गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति और खासकर चीन के विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका।
भारत को वीटो पावर कैसे मिल सकता है?
इसके लिए UN चार्टर में बदलाव करना होगा, और पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी ज़रूरी है। जब तक चीन और कुछ अन्य देश सहमत नहीं होते, यह लगभग असंभव है। हालांकि भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील (G4 देशों) ने लंबे समय से स्थायी सदस्यता की मांग की है।
अंत में…
संयुक्त राष्ट्र उम्मीदों का वह घर है, जहां दुनिया की नज़रें शांति की तलाश में लगी रहती हैं। लेकिन राजनीति, शक्ति और स्वार्थ के कारण यह संस्था अक्सर असहाय नज़र आती है। भारत जैसे देश, जो शांति, विकास और लोकतंत्र के मूल्यों को आगे बढ़ाते हैं, उन्हें अब इस मंच पर ज्यादा भूमिका मिलनी चाहिए। सवाल यह है कि क्या UN समय के साथ बदलकर खुद को प्रासंगिक बनाएगा, या इतिहास के पन्नों में “एक और लीग ऑफ नेशंस” बनकर रह जाएगा।
메타데이터
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