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कविक स्वप्न - नागार्जुन उर्फ यात्री( वैघ्नाथ मिश्र जी)

जननि हे! सूतल छलहुँ हम रातिमे नीन छल आयल कतेक प्रयाससँ। स्वप्न देखल जे अहाँ उतरैत छी, एकसरि नहुँ-नहुँ विमल आकाशसँ। फेर देखल-जे कने चिन्तित…

कविक स्वप्न - नागार्जुन उर्फ यात्री( वैघ्नाथ मिश्र जी)