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हाटी ग्राम सभा का निर्णय: क्या भारत में ग्राम सभाएँ अपनी सांस्कृतिक पहचान की अंतिम प्रहरी बन रही…

लेखक: अमित | विचार

Amit Modi · 2026-07-07 06:47 · 0 claps · 4.2 min read
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हाटी ग्राम सभा का निर्णय: क्या भारत में ग्राम सभाएँ अपनी सांस्कृतिक पहचान की अंतिम प्रहरी बन रही हैं?

लेखक: अमित | विचार

झारखंड के लोहरदगा जिले के हाटी गाँव में हाल ही में ग्राम सभा द्वारा लगाया गया एक सूचना पट्ट पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। इस सूचना पट्ट में स्पष्ट किया गया है कि धर्मांतरण के उद्देश्य से आने वाले पादरी, पास्टर अथवा अन्य व्यक्तियों का गाँव में प्रवेश स्वीकार्य नहीं होगा। ग्राम सभा ने इसे अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा और सामाजिक व्यवस्था की रक्षा का निर्णय बताया है।

यह केवल एक गाँव का निर्णय नहीं है। यह प्रश्न भारत के संविधान, आदिवासी स्वशासन, धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संरक्षण — इन चारों के बीच संतुलन का है।

संविधान क्या कहता है?

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है।

अनुच्छेद 25(1) कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को Freedom of Conscience तथा अपने धर्म को मानने (Profess), उसका पालन करने (Practice) और उसका प्रचार (Propagate) करने का अधिकार है।

लेकिन इसी अनुच्छेद की पहली पंक्ति यह भी स्पष्ट करती है कि यह अधिकार Public Order (लोक व्यवस्था), Morality (नैतिकता), Health (स्वास्थ्य) तथा संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।

अर्थात धार्मिक स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, किंतु यह निरपेक्ष (Absolute) अधिकार नहीं है।

प्रचार और धर्मांतरण — दोनों समान नहीं

धर्मांतरण संबंधी भारतीय संवैधानिक विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है —

Rev. Stainislaus v. State of Madhya Pradesh (1977) 1 SCC 677

सात दशक पुराने इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा —

“The right to propagate religion does not include the right to convert another person.”

न्यायालय ने माना कि यदि एक व्यक्ति को दूसरे का धर्म परिवर्तन कराने का मौलिक अधिकार मान लिया जाए, तो दूसरे व्यक्ति की Freedom of Conscience समाप्त हो जाएगी।

यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने बल, प्रलोभन, कपट, अनुचित प्रभाव या धोखे से कराए गए धर्मांतरण को अनुच्छेद 25 का संरक्षण प्राप्त नहीं माना। (Live Law)

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की संवैधानिक स्थिति

भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) आदिवासी क्षेत्रों की विशिष्ट पहचान को संवैधानिक संरक्षण देती है।

इसी उद्देश्य से संसद ने Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 (PESA Act) बनाया।

PESA की धारा 4(d) कहती है —

Gram Sabha shall be competent to safeguard and preserve the traditions and customs of the people, their cultural identity, community resources and customary mode of dispute resolution.

यह प्रावधान केवल प्रशासनिक अधिकार नहीं देता, बल्कि ग्राम सभा को अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की संवैधानिक संरक्षक संस्था के रूप में स्थापित करता है।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय

इसी संवैधानिक प्रश्न पर Digbal Tandi v. State of Chhattisgarh & Narendra Bhawani v. State of Chhattisgarh (निर्णय दिनांक 28 अक्टूबर 2025) में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय दिया।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ग्राम सभाओं द्वारा लगाए गए सूचना पट्ट —

  • अनुच्छेद 19(1)(d) (आवागमन की स्वतंत्रता),
  • अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता),
  • तथा संविधान की मूल भावना

का उल्लंघन करते हैं।

किन्तु न्यायालय ने विस्तृत सुनवाई के बाद कुछ महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट कीं —

1. ग्राम सभा केवल प्रशासनिक संस्था नहीं है।

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को अपनी संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक पहचान की रक्षा करने का संवैधानिक दायित्व प्राप्त है।

2. अनुच्छेद 25 धर्मांतरण का असीमित अधिकार नहीं देता।

न्यायालय ने पुनः Rev. Stainislaus के निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म प्रचार और अवैध धर्मांतरण समान नहीं हैं। (Live Law)

3. सूचना पट्ट अपने-आप में असंवैधानिक नहीं।

उच्च न्यायालय ने माना कि यदि ऐसे बोर्डों का उद्देश्य बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्मांतरण को रोकना तथा स्थानीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना है, तो उन्हें मात्र इस आधार पर असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्राम सभा की शक्ति संविधान से ऊपर नहीं है; वह भेदभावपूर्ण या मनमानी कार्रवाई नहीं कर सकती।

4. वैधानिक उपाय पहले अपनाने होंगे।

न्यायालय ने यह भी कहा कि PESA Rules के अंतर्गत उपलब्ध वैधानिक उपायों का उपयोग किए बिना सीधे उच्च न्यायालय आना उचित नहीं था। इसलिए याचिकाओं का निस्तारण करते हुए संबंधित प्राधिकरणों के समक्ष जाने की स्वतंत्रता दी गई।

सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका

फरवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने वाली याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार किया और याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने की बात दोहराई। यह आदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को पलटे बिना पारित हुआ।

हाटी ग्राम की पहल क्यों महत्वपूर्ण है?

झारखंड के अधिकांश आदिवासी क्षेत्र भी पाँचवीं अनुसूची और PESA व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं।

यदि कोई ग्राम सभा —

  • विधिवत बैठक बुलाती है,
  • वैधानिक प्रक्रिया का पालन करती है,
  • संविधान और PESA के अनुरूप प्रस्ताव पारित करती है,
  • तथा उसका उद्देश्य अपनी पारंपरिक संस्कृति की रक्षा है,

तो उसके निर्णयों को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि संवैधानिक संदर्भ में भी समझा जाना चाहिए।

हालाँकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि ऐसे किसी भी निर्णय का उपयोग किसी नागरिक के साथ अवैध भेदभाव, हिंसा, धमकी या उसके मौलिक अधिकारों के हनन के लिए नहीं किया जा सकता। संविधान की सर्वोच्चता हर स्थिति में बनी रहती है।

सरना-सनातन सहयोग: एक सामाजिक संकेत

हाटी ग्राम की पहल का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि स्थानीय स्तर पर सरना और सनातनी परिवारों ने इसे सांस्कृतिक संरक्षण के साझा प्रयास के रूप में समर्थन दिया है। यदि यह सहयोग परस्पर सम्मान, सामाजिक समरसता और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर विकसित होता है, तो यह आदिवासी समाज के आत्मविश्वास और स्थानीय स्वशासन की नई दिशा भी बन सकता है।

हाटी ग्राम की सूचना पट्टी केवल एक बोर्ड नहीं है। यह उस बड़े संवैधानिक प्रश्न का प्रतीक है जिसमें भारत यह तय कर रहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता, आदिवासी स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

भारतीय संविधान धर्म मानने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि किसी अन्य व्यक्ति का धर्म परिवर्तन कराना — विशेषकर यदि उसमें बल, प्रलोभन, कपट या अनुचित प्रभाव शामिल हो — अनुच्छेद 25 के संरक्षण के दायरे में नहीं आता।

इसी प्रकार PESA ग्राम सभाओं को संस्कृति और परंपरा की रक्षा का अधिकार देता है, परंतु यह अधिकार भी संविधान की सीमाओं के भीतर है।

इसलिए हाटी ग्राम की घटना को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय भारत के संवैधानिक ढाँचे, आदिवासी स्वशासन और सांस्कृतिक अधिकारों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना अधिक उचित होगा। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है, और यही संविधान की वास्तविक भावना भी।

आदिवासियों का धर्मयुद्ध: क्या भारत में ग्राम सभाएँ अपनी सांस्कृतिक पहचान की अंतिम प्रहरी बन रही हैं?

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